Sunday, 16 January 2022

Shattila Ekadashi षटतिला एकादशी की विधि, महत्व,माहात्म्य एवं व्रत कथा

जय श्री कृष्ण दोस्तों आज हम Shattila Ekadashi fast in hindi षटतिला एकादशी जो माघ माह (जनवरी) में पढती है,और माघ माह को भगवान विष्णु का महीना माना जाता है। हिंदू पंचांग तथा शास्त्रों के अनुसार, माघ मास की कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को षटतिला एकादशी कहते हैं। एकादशी का व्रत सभी कामनाओं की पूर्ति के लिए तथा मोक्ष प्राप्ति के लिए रखा जाता है। इस दिन भगवान विष्णु,कृष्ण, श्रीराम यानी तीनों स्वरूपों की सच्चे मन से उपासना और व्रत करने से मनोवांछित फलों की प्राप्ति होती है। एकादशी का व्रत दशमी तिथि से शुरू होकर तीन दिन अर्थात द्वादशी को सम्पन्न होता है। इस दिन तिल के दान का भी विशेष महत्व होता है। इस आर्टिकल में हम आपको षटतिला एकादशी का सम्पूर्ण विधि विधान और महत्व बताएंगे।

Shattila Ekadashi षटतिला एकादशी की विधि, महत्व,माहात्म्य एवं व्रत कथा

एकादशी व्रत की विधि एवं माहात्म्य

 दालभ्य ऋषि बोले कि मनुष्य लोक में आकर लोग ब्रह्महत्यादि अनेक पाप करते हैं , पराये धन को चुराते हैं। दूसरों को कष्ट देते हैं । ऐसा करने पर भी वे नरक में न जायें । हे ब्रह्मन् ! ऐसा उपाय कहिये ।जिससे मनुष्य के सभी पाप तर जाए, अल्पदान करने से अनायास पाप दूर हो जाँय उसे केहिये । पुलस्त्य मुनि बोले - हे महाभाग ! तुमने बहुत सुन्दर प्रश्न किया है । जिसको ब्रह्मा , विष्णु और इन्द्रादि देवताओं ने किसी से नहीं कहा । तुम्हारे पूछने पर उस गुप्त बात को तुमसे कहूँगा । माघ मास के आरम्भ में ही शुद्धता से स्नान करके इन्द्रियों को वश में करे ।

 काम, क्रोध, घमण्ड, ईर्ष्या, लोभ,दुराचार और चुगली इनसे मन को हटाकर जल से हाथ पैर धोकर भगवान् का स्मरण करे । ऐसा गोबर ले जो पृथ्वी पर न गिरा हो । उसमें तिल और कपास मिलाकर पिंड बना ले । उनके १०८ पिंड बनावे । यदि माघ के महीने में पूर्वाषाढ़ व मूल नक्षत्र में एकादशी आ जाय तो उसमें नियम ले या कृष्ण पक्ष की एकादशी को नियम ले । उसका पुण्य फल देने वाला विधान मुझसे सुनो । स्नान करके पवित्र होकर कीर्तन करते हुए एकादशी का उपवास करे । रात्रि में जागरण करे और गोबर के बने हुए १०८ पिंडों से हवन करे । शंखचक्र गदाधारी भगवान् का पूजन करे । चन्दन , अगर , कपूर चढ़ावे । बूरा मिला हुआ नैवेद्य चढ़ाकर बारम्बार कृष्ण का नाम स्मरण करे । हे विप्रेन्द्र ! पेठा , बिजौरा और नारियल आदि से पूजा करे । यदि इन सबका अभाव हो तो सुपारी ही श्रेष्ठ है । फिर अर्घ्य देकर जनार्दन का पूजन करके प्रार्थना करे । हे कृष्ण ! आप दयालु तथा पापियों को मोक्ष देने वाले हो । हे परमेश्वर ! संसार सागर में डूबे हुए प्राणियों पर आप प्रसन्न हों । हे पुण्डरीकाक्ष ! हे विश्वभावन ! आपको नमस्कार है ।

 हे सुब्रह्मण्य ! हे जगत्पते ! मेरे दिये हुए अर्घ्य को लक्ष्मी समेत स्वीकार करिये । फिर छत्र , उपानह और वस्त्र ब्राह्मणों को देकर पूजन करे , जल से भरा हुआ कलश दे और कहे कि श्रीकृष्ण भगवान् मेरे ऊपर प्रसन्न हों । हे के द्विजोत्तम ! काली गो और तिलपात्र अपनी शक्ति • अनुसार उत्तम ब्राह्मण को देना चाहिये । हे मुने ! स्नान और भोजन में सफेद और काले तिल उत्तम हैं इसलिये यथा शक्ति ब्राह्मणों को भी देने चाहिये । तिल - स्नान उबटना , होम , तर्पण , भोजन और दान करे ये छः प्रकार की विधि पापों का नाश करती है । इसी से इस एकादशी का नाम षट्तिला है । नारदजी बोलें हे कृष्ण ! हे भक्तभावन ! षट्तिला एकादशी से क्या फल मिलता है ? यदि आप मेरे ऊपर प्रसन्न हैं तो -- - इतिहास समेत मुझसे कहिये । श्रीकृष्ण बोले -- ब्रह्मन् जैसा वृत्तान्त मैंने देखा है , वह तुमसे कहता हूँ । 

षटतिला एकादशी व्रत कथा

एक ब्राह्मणी मनुष्यलोक में ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करती हुई देवताओं का पूजन करती थी । वह पूरे मास उपवास करती हुई पूजा में लगी रहती थी । द्विजोत्तम ! नित्य व्रत करने से उसका शरीर दुर्बल हो गया । गरीब ब्राह्मण और कुमारी कन्याओं को भक्ति से वह अपना घर तक दान करके सदा व्रत करने लगी । जिससे वह बहुत दुर्बल हो गई । उसने अन्न दान करके ब्राह्मण और देवताओं को तृप्त नहीं किया । फिर बहुत दिनों के बाद मैंने मन में विचार किया कि कठिन व्रतों के करने से इसका शरीर शुद्ध हो गया है । 

शरीर को सुखाकर इसने स्वर्ग जाने के योग्य अपना देह बना लिया है । किन्तु इसने अन्न का दान नहीं किया जिससे कि सबकी तृप्ती होती है । हे ! उसकी जाँच करने को मैं मनुष्य लोक में ब्रह्मन् गया । भिक्षुक का रूप धारण करके भिक्षा पात्र लेकर ब्राह्मणी से भीख माँगने लगा । तब ब्राह्मणी बोली - हे ब्रह्मन् ! तुम कैसे से आये सो मुझसे सत्य कहो । फिर मैंने कहा- हे सुन्दरि ! भिक्षा दो । तब उसने क्रोध में भरकर मिट्टी का डेला मेरे भिक्षा पात्र में डाल दिया । महा व्रत करने वाली वह तपस्विनी व्रत के प्रभाव से देह समेत स्वर्ग में पहुँच गई और मिट्टी के पिंड दान करने से उसको एक सुन्दर घर भी मिल गया । परन्तु उस घर में अन्न और धन नहीं था । हे विप्रर्षे ! जो उसने घर में प्रवेश किया तो वहाँ कुछ भी नहीं देखा । हे द्विज ! तब घर से निकल वह मेरे पास आई और बहुत कुपित होकर बोली कि सब लोकों को रचने वाले भगवान का मैंने बड़े कठिन व्रत उपवास और पूजा से आराधन किया है । परन्तु हे जनार्दन ! मेरे घर में अन्न , धन कुछ भी नहीं है । तब मैंने उससे कहा कि तू जैसे आई है , उसी तरह अपने घर चली जा।  

षटतिला एकादशी का माहात्मय बिना पूछे देवताओं की स्त्रियाँ कौतूहल के वश तुझको देखने दरवाजा मत खोलना । ऐसा सुनकर वह मनुष्य लक को चली गई । हे नारद ! तब देवताओं की स्त्रियाँ उसे , देखने आयीं और कहा कि हम तुम्हारे दर्शन के लिये आई हैं । तुम दरवाजा खोलो । मानुषी बोली -यदि तुम मुझे देखना ही चाहती हो तो दरवाजा खोलने से पहले षट्तिला का व्रत पुण्य और माहात्म्य कहना होगा । उनमें से एक ने माहात्म्य सुना दिया और कहा कि हे मानुषी ! अब दरवाजा खोल दो , तुमको देखना आवश्यक है । उसने दरवाजा खोल दिया । उन सबने मांनुषी को देख लिया । हे द्विज श्रेष्ठ ! वह न तो देवी है , न गन्धर्वी है , न आसुरी है , न नागिन है , जैसी स्त्री पहिले उन्होंने देखी थी , वैसी ही वह भी थी । देवियों के उपदेश से सत्य पर चलने वाली उस मानुषी ने भुक्ति और मुक्ति को देने वाली षट्तिला का व्रत किया । 

तब वह मानुषी क्षण भर में रूपवती और कान्तियुक्त हो गई । और उसके यहाँ धन , धान्य , वस्त्र , सुवर्ण , चाँदी ये सब हो गया । षटतिला के प्रभाव से सब घर धन धान्य से पूर्ण हो गया । लोभ के वश होकर बहुत तृष्णा नहीं करनी चाहिये । अपने धन के अनुसार तिल , वस्त्र आदि का जरूर दान करे । इससे जन्मान्तर में आरोग्यता होती है । हे द्विज श्रेष्ठ ! षटतिला का उपवास करने से दरिद्रता , मन्द भाग्य और अनेक प्रकार के कष्ट नहीं होते । विधि पूर्वक किया हुआ दान सब पापों का नाश करता है । हे मूनि सत्तम ! इससे शरीर में थकावट , अनर्थ अथवा कष्ट नहीं होता ।

अन्य सम्बन्धित बेबदुनियां

👉 माणिक्य रत्न जो खोल दे भाग्य के द्वार 
👉 सुलेमानी हकीक स्टोन जो बना दें पल में मालामाल
👉 सर्वार्थ सिद्धी के लिए धारण करें हनुमान चालीसा यंत्र लाॅकेट 
👉 स्वास्थ्य की चाबी है मोती रत्न के पास मोती रत्न के लाभ
👉 मंगल ग्रह का मूंगा रत्न लाभ हानि और विधि से प्राप्त करें सुख समृद्धि 
👉 बुद्ध ग्रह के पन्ना रत्न के ढेरों लाभ
👉 सफलता की चाबी है गुरु रत्न पुखराज के पास 
👉 जानिए हीरा रत्न के गुण-दोष और लाभ हानि के बारे किसे मिलेगा फायदा
👉 सर्व शक्तिशाली और किस्मत चमकाने वाला भाग्य रत्न नीलम के फायदे 

Wednesday, 12 January 2022

16 Sanskar/जानिए सोलह संस्कार तथा गर्भाधान,नामकरण, अन्नप्राशन, मुंडन,कर्णवेध, चूडाकर्म संस्कारों का शुभ मुहूर्त, तिथि,वार,नक्षत्र एवं महत्व

नमस्कार दोस्तों हमारा सनातन हिन्दू धर्म एक शाश्वत और प्राचीन धर्म है। हमारी संस्कृती का समस्त विश्व घोतक माना जाता है,और यह भी परम्परा है कि इसकी स्थापना ऋषियों और मुनियों ने की है। हिन्दु धर्म में 16 संस्कारों का महत्व है। क्योंकि भारतीय संस्कृति में हर कार्य किसी मुहूर्त के अनुसार ही किया जाता है।

16 Sanskar/जानिए सोलह संस्कार तथा गर्भाधान,नामकरण, अन्नप्राशन, मुंडन,कर्णवेध, चूडाकर्म संस्कारों का शुभ मुहूर्त

प्राचीन काल में ऋषि मुनियों ने मानव जीवन को सुसंस्कारित बनाने के लिए जन्म से मृत्यु तक विधि-विधान पूर्वक संस्कारों की व्यवस्था की है। जिसका पालन प्राचीन काल से ही भारतीय संस्कृति से अनवरत हो रहा है। संस्कार जीवन को परिष्कृत करते है। इसलिए ऐसे संस्कारों को संपादित करने के लिए शुभकाल की आवश्यकता होती है। जिसके लिए ज्योतिष में मुहूर्त शास्त्र के अन्तर्गत प्रत्येक कार्य के लिए शुभ तिथि, शुभ नक्षत्र,  शुभ वार, शुभ लग्न बताए गये है। आज हम कुछ महत्वपूर्ण संस्कारों का मुहूर्त आपको बता रहे है। लेकिन उससे पहले इन संस्कारों में जन्मपूर्व से लेकर बाल्यकाल तक 10 संस्कार तथा बाकी 6 शैक्षणिक व अन्त्येष्टि पर्यन्त के संस्कार है। 

16 संस्कार इस प्रकार से है ----
1, गर्भाधान                2, पुंसवन
3, सीमान्तोन्नयन         4, जातकर्म
5, नामकरण               6, चूडाकर्म 
7, निष्क्रमण                8, अन्नप्राशन  
9, कर्मवेध                   10, विद्यारम्भ
11, उपनयन                12, वेदारम्भ  
13, केशान्त                  14, समावर्तन 
15, विवाह                    16, अन्त्येष्टि

1- गर्भाधान संस्कार 

मानव जीवन का आरम्भ इसी संस्कार से होता है। इसीलिए अच्छी सुयोग्य तथा संस्कार वान सन्तति प्राप्ति के लिए बनाये गये शास्त्रीय नियम सफल होते है। स्त्री रजोदर्शन होने के 16 दिन पर्यन्त गर्भधारण के योग्य रहती है। इसलिए प्रथम 4 दिनो को छोडकर सम दिनों में गर्भधारण करने से पुत्र प्राप्ति के योग बनते है तथा विषम दिनों में कन्या के योग बनते है।

गर्भधारण का शुभ मुहूर्त 

शुभ तिथि - दोनो पक्षों के 2,3,5,7,10,11,12,13

शुभ वार -रविवार, सोमवार,बुधवार, वृहस्पतिवार, शुक्रवार 

शुभ नक्षत्र - ज्येष्ठा, मूल, मघा, रेवती को छोडकर सभी नक्षत्र।

2- नामकरण संस्कार मुहूर्त 

नामकरण एक अत्यंत महत्वपूर्ण संस्कार है। जीवन में व्यवहार का सम्पूर्ण आधार नाम पर ही निर्भर होता है। व्यक्ति का नाम जीवन में बहुत महत्व रखता है। सामान्यतः बच्चों का नाम सम अक्षरों में रखना चाहिए। व्यवहारिक नाम 2, 4 या 6 अक्षर का उत्तम होता है। यश एवं मान प्रतिष्ठा के लिए 2 अक्षर, ब्रह्मचर्य तप पुष्टि की कामना के लिए 4 अक्षर का नाम श्रेष्ठ होता है। बालक का नाम विषम अक्षर वाला न हो तो अच्छा है। किन्तु बालिकाओं का नाम विषम अक्षर वाला श्रेष्ठ रहता है। नक्षत्र,  नदी , वृक्ष, सर्प, सेवक सम्बन्धित एवं भयभीत करने वाले नाम न रखें।  नामकरण पिता या कुलश्रेष्ठ व्यक्ति द्वारा होना चाहिए। 

यह संस्कार 11 वें या 12वें दिन शुबह के समय किया जाना चाहिए। किन्तु अगर किसी प्रकार का सूतक लगा हो तो आप देशकाल परिस्थिति के अनुसार 10,12,16,19,22 वें दिन नामकरण संस्कार कर सकते हैं। 

नामकरण मुहूर्त 

शुभ तिथि - 1(कृष्ण),2,3,7,10,11,(13-शुक्ल)

शुभ वार - सोमवार,  बुधवार, गुरूवार, शुक्रवार 

शुभ नक्षत्र - अश्विनी, रोहिणी, मृगशिरा, पुनर्वसु, तीनों उत्तरा,  हस्त ,चित्रा, स्वाति, अनुराधा,शतविषा,रेवती।

नामकरण विधि - गणेशजी का पूजन करने के बाद कांस की थाली में चावल फैलाकर 5 पत्ते पीपल पर 5 नामलिखकर उसका पूजन करें।  बच्चे को माता की गोद में पूर्वं मुख करके बिठा कर तथा उसके बाद उन नामों का उल्लेख कुलश्रेष्ठ  बच्चे के कान में कहें। 

3- बालक/बालिका का प्रथम निष्क्रमण मुहूर्त 

जन्म के तीसरे ,चौथे महीने में शुभ तिथि वार अनुसार घर से निर्गमन यानी परिजनो या ननिहाल ले जाना शुभ माना जाता है। नियम अनुसार तीसरे महीने सूर्य दर्शन और चौथे महीने चन्द्रमा दर्शन कराने चाहिए।  जिस दिन बालक/ बालिका को घर से बाहर ले जाएं उस दिन स्नानादि करा कर साफ वस्त्र अलंकृत करें तथा घलर के मंदिर में अपने ईष्ट देवता का दर्शन कराएं। 

मंदिर या घर में ही पूजार्चना करने के बाद ही बालक/बालिका को ननिहाल या अन्य परिजनों के घर ले जाएं। और बच्चों को सूर्य दर्शन तीसरे महीने कराना चाहिए तथा चौथे महीने चन्द्रमा दर्शन कराने चाहिए। 

नामकरण संस्कार मुहूर्त 

शुक्ल पक्ष - 2,3,5,7,11,13,15

कृष्ण पक्ष - 1,2,3,5,7,10,11

शुभ नक्षत्र - अश्विनी, रोहिणी,  मृगशिरा, पुष्प, तीनों उत्तरा, हस्त, चित्रा,अनुराधा,  रेवती।

शुभ वार - सोमवार, बुधवार, गुरूवार, शुक्रवार 

4- अन्न-प्राशन संस्कार -

माता के दूध से पोषित होने वाले बालक को प्रथम बार अन्न खिलाने का प्रचलन बहुत पुराने समय से चला आ रहा है।, जो एक संस्कार के रूप में किया जाता है। बालक का अन्नप्राशन 6,8,10,12 वें महीने में करना चाहिए तथा बालिका का 5,7,9 वें महीने में करना चाहिए।

शुभ तिथि - शुक्ल पक्ष में 2,3,5,7,10,13,15 तिथियाँ 

शुभ वार - सोमवार, बुधवार, गुरूवार, शुक्रवार 

शुभ नक्षत्र - अश्विनी, रोहिणी, मृगशिरा, पुनर्वसु, पुष्प तीनो उत्तरा, हस्त, स्वाति, अनुराधा, श्रवण, धनिष्ठा, रेवती

5- कर्ण-वेध संस्कार मुहूर्त 

वैज्ञानिक महत्व  - आभूषण धारण व वैज्ञानि रूप से कर्ण क्षेदन का महत्व होने के कारण इस प्रक्रिया को संस्कार रूप में स्वीकार किया गया है।। सुश्रुत ने कहा है कि कर्ण छेद करने से अण्डकोश वृद्धि, अन्न वृद्धि का निरोध होता है। शिशु के जन्म से 12 या 16 वें दिन तथा 6,7,8 महिने या विषम वर्षो में कर्ण वेध करना चाहिए।  चैत्र, पौष हरिशयन काल तथा जन्म महीने, जन्म नक्षत्र में कर्ण वेध संस्कार नहीं करना चाहिए। 

शुभ तिथि - शुक्ल पक्ष में 2,3,5,6,7,10,12,13 तिथियाँ

शुभ वार - सोमवार, बुधवार, गुरूवार, शुक्रवार 

शुभ नक्षत्र - अश्विनी, मृगशिरा, पुनर्वसु, पुष्प,  हस्त, चित्रा, श्रवण,धनिष्ठा, रेवती 

6- चूडाकर्म संस्कार मुहूर्त 

चूडाकर्म जातक की गर्भजन्य अशुद्धियों को दूर करने के लिए किया जाता है। इस संस्कार को तीसरे या पांचवें वर्ष करना चाहिए।  यह संस्कार बालक के जन्म से 3,5 या 7 वें वर्ष में किया जाता है।  चैत्र को छोडकर शेष उत्तरायण के सूर्य में करना चाहिए। 

शुभ तिथि - 1(कृष्ण) 2,3,5,7,10,11 (दोनों पक्ष में) 13 (शुक्ल) और कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी से तीन दिन 13,14,30 को छोडकर ।

शुभ वार - सोमवार, बुधवार, वृहस्पति, शुक्रवार 

शुभ नक्षत्र - अश्विनी, मृगशिरा, पुनर्वसु, पुष्प, हस्त, चित्रा, स्वाति, ज्येष्ठा, श्रवण, धनिष्ठा, रेवती

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Monday, 10 January 2022

Dreams interpretations स्वप्न शास्र के अनुसार 55 सपनों का शुभ व अशुभ फल/जानिए क्या मतलब है सपने देखने का,जानिए क्यों किसलिए कैसे कहाँ आते हैं सपनें

नमस्कार दोस्तों आज हम Swapan Shastra in hindi यानी श्वप्न के बारे मे बात कर रहे है,दोस्तों हर कोई कभी न कभी सोते समय सपने जरूर देखता है, और शस्त्रों में यह कहा गया है कि हमें सपनें में वही दिखता है जो हमारे साथ हुआ होगा या होने वाला होगा। कई बार ये सपने हमारी सोच का नतीजा होते हैं। आज इस आर्टिकल में हम लगभग 55 सपनों के शुभ और अशुभ फल के प्रभाव के बारे में बात करने वाले है।

Dreams interpretations स्वप्न शास्र के अनुसार 55 सपनों का शुभ व अशुभ फल/जानिए क्या मतलब है सपने देखने का,जानिए क्यों किसलिए कैसे कहाँ आते हैं सपनें 

स्वप्न शास्त्र के अनुसार हर तरह के स्वप्न के कुछ संकेत अवश्य देते हैं। इन संकेतों को समझने का प्रयास करना चाहिए क्योंकि यह सपने हमें आगे आने वाली समस्याओं, घटनाओं से सचेत करते है। दोस्तों कुछ सपने (Dreams) अच्‍छे होते हैं और कुछ डरावने होते हैं। लेकिन वे सपने शुभ हैं या अशुभ हैं इसका पता स्वप्‍न शास्त्र में दिए गए उनके मतलब से पता चलता है।

क्योंकि जब तक हमें किसी चीज का होने का अहसास नहीं होता उसका हमपर कोई प्रभाव नहीं पडता स्‍वप्‍न शास्‍त्र (Swapana Shastra) में कुछ सपनों को बेहद शुभ बताया गया है।लेकिन कुछ जीवन में आने वाली अशुभ फलों का संकेत भी देते है। ये सपने आने पर व्‍यक्ति की किस्‍मत खुल जाती है। सफलता का माध्यम भी बनते है। उसके जीवन में लक्ष्मी कुबेर की प्राप्ति होती है अपार धन-संपत्ति (Wealth) मिलती है। और साथ ही साथ जिंदगी और परिवार में खुशियां भी दस्‍तक देती हैं। आइये जानते हैं कुछ सपनों के बारे में बात करते है।

Swapan Shastra

Swapan Shastra


Friday, 7 January 2022

Somvar Vrat Katha सोमवार व्रत कथा महत्व एवं पूजन विधि

नमस्कार दोस्तों भगवान शिव तथा माता पार्वती का आशीर्वाद प्राप्त करने के सर्वोत्तम उपाय है सोमवार का व्रत। इस व्रत से भक्त की सभी मनोकामनाएं पूर्ण हो जाती है, क्योंकि भोलेनाथ थोडी सी भक्ति से भी प्रसन्न हो जाते है। इनकी भक्ति से व्यक्ति अकाल मृत्यु से भी वापस आ सकता है तथा औरतें पुत्र प्राप्ति तथा संतान प्राप्ति के लिए सोमवार का व्रत रखती है। कन्याएं अच्छा वर पाने की कामना से सोमवार व्रत को रखती है। शिव की कृपा से भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण हो जाती है। 

Somvar Vrat Katha सोमवार व्रत कथा महत्व एवं पूजन विधि 

सोमवार व्रत की विधि

सोमवार का व्रत सामान्यतः दिन के तीसरे पहर तक होता है। धार्मिक ग्रन्थों के अनुसार सोमवार व्रत में व्यक्ति को प्रातः स्नान करके शिव जी को जल और बेल पत्र चढ़ाना चाहिए तथा शिव-गौरी की पूजा करनी चाहिए।इस व्रत मे फलाहार तथा पारण का कोई महत्व नहीं है।  शिव पूजन के बाद सोमवार व्रत कथा सुननी चाहिए इसके बाद केवल एक समय ही भोजन करना चाहिए। शास्त्रों के अनुसार  सोमवार व्रत तीन प्रकार का होता है प्रति सोमवार व्रत, सौम्य प्रदोष व्रत और सोलह सोमवार का व्रत, इन सभी व्रतों के लिए एक ही विधि-विधान होती है। और तीनों व्रतों का अलग-अलग महत्व है।

सोमवार व्रत कथा/Somvar vrat katha 

एक बहुत धनी सेठ था , जिसके पास सम्पूर्ण वैभव था । परन्तु उसे एक दुःख था कि उसके कोई पुत्र नहीं था । वह इसी सोच में दिन - रात चिन्तित रहता था । वह पुत्र की प्राप्ति के लिए सोमवार को शंकरजी का व्रत और पूजन करता था । सायंकाल शंकरजी के मंदिर में दीपक जलाता था । उसकी भक्ति को देखकर एक समय श्री पार्वती जी ने शंकरजी से कहा कि महाराज ! यह सेठ आपका अनन्य भक्त है । हमेशा आपका व्रत और पूजन बड़ी श्रद्धा पूर्वक करता है आपको इसकी मनोकामना पूर्ण करनी चाहिए । शंकरजी ने पार्वती जी से कहा यह संसार कर्म क्षेत्र है । किसान खेत में जैसे बीज बोयेगा उसे फल वैसे ही प्राप्त होंगे । 

पार्वतीजी ने अत्यन्त विनम्र पूर्वक कहा कि जब यह आपका भक्त है और इसे कोई दुःख है तो आपको अवश्य ही इसके दुःख को दूर करना चाहिए । क्योंकि आपने अपने भक्तों पर हमेशा कृपा की है । उनके दुःखों को दूर किया है । अगर आप ऐसा करेंगे तो मनुष्य ही आपकी सेवा , व्रत , कथा , पूजन करेंगे । पार्वतीजी का आग्रह सुनकर शंकरजी कहने लगे कि हे पार्वतीजी ! उसके कोई पुत्र नहीं है इसी कारण वह दुःखी रहता है । उसके भाग्य में पुत्र नहीं है । तब भी मैं इसको पुत्र की प्राप्ति का वर देता हूँ । लेकिन वह पुत्र ११ वर्ष तक ही जीवित रहेगा , तत्पश्चात वह मृत्यु को प्राप्त होगा । इससे अधिक और मैं कुछ नहीं कर सकता । यह सभी बात वह सेठ सुन रहा था । इससे उसे न प्रसन्नता हुई और न ही दुःख हुआ । वह पहले की भाँति शंकरजी का सोमवार व्रत तथा पूजन करता . रहा । कुछ समय व्यतीत हो जाने पर सेठ की स्त्री गर्भवती हुई तथा दसवें महीने उसके गर्भ से बहुत सुन्दर पुत्र उत्पन्न हुआ । 

सेठ के घर में बहुत खुशियाँ मनाई गई । लेकिन सेठ ने उसकी उम्र केवल ११ वर्ष जानकर अधिक खुशी प्रकट नहीं की । न किसी को भेद बताया , जब वह बालक दस वर्ष का हो गया तो उसकी माँ ने उसके पिता से विवाह के लिए कहा । लेकिन वह सेठ कहने लगा कि इसका विवाह अभी नहीं करूँगा । इसे काशी पढ़ने भेजूँगा । उस सेठ ने अपने साले ( लड़के के मामा ) को बुलाकर उसे बहुत सारा धन देकर कहा कि तुम इस लड़के को काशी पढ़ने के लिए ले जाओ और रास्ते में जिस तरफ भी जाओ यज्ञ करना तथा ब्राह्मणों को भोजन कराते जाना । वह दोनों मामा और भानजे रास्ते में सब जगह यज्ञ कराते तथा ब्राह्मणों को भोजन कराते जा रहे थे । उनको जाते समय रास्ते में एक शहर पड़ा । उस शहर के राजा की कन्या का विवाह तथा दूसरा राजा का लड़का जो विवाह के लिए बारात लेकर आया था एक आँख से काना था । 

लड़के के पिता को यह बड़ी चिन्ता थी कि कहीं वर को देख कन्या के माता - पिता शादी में किसी प्रकार की अड़चन पैदा न कर दें । इस कारण जब उसने बहुत सुन्दर सेठ के लड़के को देखा तो मन में विचार किया कि क्यों न इस लड़के से वर का काम लिया जावे । ऐसा सोचकर राजा ने लड़के तथा उसके मामा से कहा तो वह राजी हो गये । तब सेठ के लड़के को स्नान आदि कराकर वर के कपड़े पहनाये तथा घोड़ी पर चढ़ाकर कन्या के यहाँ ले गये । वर के पिता ने सोचा कि विवाह कार्य भी इसी लड़के से करा दिया जावे तो क्या बुराई है ऐसा विचार कर उन्होंने उसके मामा से कहा कि अगर आप फेरों और कन्यादान का काम भी करा दें तो आपकी बड़ी कृपा होगी । इसके बदले में हम आपको बहुत सारा धन दे देंगे ।

उन्होंने यह स्वीकार कर लिया और उसने विवाह तथा फेरों का कार्य भी कर दिया । फेरों के बाद जब लड़का जाने लगा तो उसने राजकुमारी की चुंदरी के पल्ले पर लिख दिया कि तेरा विवाह तो मेरे साथ हुआ है लेकिन जिस राजकुमार के साथ तुम्हें भेजेंगे वह एक आँख से काना है और मैं काशीजी पढ़ने जा रहा हूँ । राजकुमारी ने जब अपनी चुंदरी पर इस प्रकार लिखा पाया तो उसने राजकुमार के साथ जाने से इन्कार कर दिया और कहा कि यह मेरा पति नहीं है । मेरा विवाह इसके साथ नहीं हुआ है । वह काशी पढ़ने गया है । राजकुमारी के माता - पिता ने अपनी कन्या विदा नहीं की और बारात वापिस चली गई । उधर सेठ का लड़का और उसका मामा काशी पहुँच गये तथा वहाँ जाकर उन्होंने यज्ञ आदि धर्म कार्य करने तथा लड़के ने • पढ़ना शुरू कर दिया ।

जब लड़के की आयु ११ वर्ष की हो गई तब उस दिन उन्होंने यज्ञ का आयोजन किया था उसी समय लड़के ने अपने मामाजी से कहा कि मामाजी आज मेरी तबियत ठीक नहीं है । मामा ने कहा कि तुम अन्दर जाकर सो जाओ । लड़का अन्दर जाकर सो गया और सोते ही उसके प्राण निकल गये । जब उसके मामा ने जाकर देखा तो वह मुर्दा पड़ा है । उसको बहुत दुःख हुआ लेकिन उसने सोचा कि अगर रोना पीटना शुरू कर दूँगा तो यज्ञ का कार्य अधूरा रह जावेगा । अतः उसने शीघ्र ही यज्ञ का कार्य पूर्ण कराया तथा ब्राह्मणों के जाने के पश्चात् रोना - पीटना शुरू कर दिया । संयोगवश उसी समय शंकरजी तथा पार्वतीजी उधर से जा रहे थे । जब उन्होंने जोर जोर से रोने - पीटने की आवाज सुनी तो पार्वतीजी शंकरजी से आग्रह करके उसके पास ले गई और सुन्दर बालक को मरा हुआ देखकर कहने लगीं कि यह तो उसी सेठ का लड़का है जो आपके वरदान से हुआ था । शंकरजी ने पार्वतीजी से कहा कि इसकी उम्र इतनी ही थी . जो समाप्त हो चुकी है ।

 पार्वतीजी ने शंकरजी से कहा कि महाराज 1 कृपा करके इस बालक की आयु और बढ़ा दो वरना इसके माता - पिता तड़प - तड़प कर मर जावेंगे । पार्वतीजी के इस प्रकार के बार - बार के आग्रह करने पर शंकरजी ने उसको वरदान दिया और शंकरजी की कृपा से बालक जीवित हो गया । शंकर पार्वती कैलाश को चले गये तथा वह लड़का एवं उसका मामा उसी भाँति यज्ञ कराते हुए अपने घर की ओर चल पड़े । रास्ते में उसी शहर में आये जहाँ उस लड़के का विवाह हुआ था । वहाँ पहुँचकर जब उन्होंने यज्ञ आरम्भ कर दिया तो उस लड़के के श्वसुर ने उसको पहचान लिया और अपने महल में लाकर उसकी बड़ी खातिरदारी की । साथ ही बहुत सारा धन दिया तथा दासियों के सहित बड़े आदर सत्कार के साथ अपनी लड़की को उसके साथ विदा कर दिया । जब वह सब अपने शहर के नजदीक आये तो उसके मामा ने कहा कि पहले मैं तुम्हारे घर जाकर आने की खबर कर आता हूँ ।

उस समय उसके माता - पिता घर की छत पर बैठे हुए थे और उन्होंने यह प्रण कर रखा था कि यदि हमारा लड़का सकुशल घर लौट आया तो राजी - खुशी नीचे आ जावेंगे वरना छत से गिरकर अपने प्राण दे देंगे । इतने में उसके मामा ने आकर यह समाचार दिया कि आपका लड़का आ गया है । लेकिन उन्हें विश्वास न हुआ तो उसके मामा ने शपथपूर्वक कहा कि आपका लड़का अपनी पत्नी तथा बहुत सारा धन साथ लेकर आया है । तब सेठ ने उसका बड़े प्रसन्नतापूर्वक स्वागत किया और घर ले आये वहाँ वह बड़ी प्रसन्नता के साथ रहने लगे । इस प्रकार जो भी सोमवार के व्रत को धारण करता है अथवा इस कथा को पढ़ता या सुनता है । उसके सभी दुःख दूर होकर उसकी सभी मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं।

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Tuesday, 4 January 2022

Seven words of 7 rounds in marriage शादी के 7 वचनों का महत्व, क्यों आ रही है समाज में सभ्यता और संस्कारों की कमीं

नमस्कार दोस्तों परिवार बहुत ही महत्वपूर्ण अंग है देश व समाज की तरक्की का का क्योंकि बच्चा जो घर में सीखेगा वैसा ही उसका विकास होगा। क्योंकि मूल्य, जीवन को गुणवत्ता व अर्थ प्रदान करते हैं और व्यक्ति को उसकी पहचान एवं चरित्र निर्माण हो पाता है, बच्चे अपने माता- पिता, शिक्षक और हम उम्र बच्चों से मूल्य सीखते हैं।

Seven words of 7 rounds in marriage शादी के 7 वचनों का महत्व, क्यों आ रही है समाज में सभ्यता और संस्कारों की कमीं 

दोस्तों किसी गालिब ने बडे अच्छे शब्दों में कहा है --

गलती जीवन का एक पेज है,
किन्तु रिश्ते जीवन की एक किताब है ।
जरूरत पढने पर गलती का एक पेज फाड देना,
किन्तु एक पेज के लिए पूरी किताब मत खो देना ।

आज हम रोते विलखते है कि हमारे बच्चे हमारी बात नहीं मानते, हमें महत्व नहीं देते, बुढापे में बेसहारा छोड देते है। इसका कारण हम ही है। क्योंकि हमने बीज ही ऐसा बोया है। जो वचन शादी के समय सात फेरों में दिए जाते। हमने केवल उसे रीति रिवाज के तौर पल लिया जबकी हमारे शास्त्रों में उन सात वचनों का बडा महत्व है।

इसीलिए जब हमने ही उन वचनों को महत्व नहीं दिया तो फिर आज कल के बच्चे तो इक्कीसवीं शदी में जीवन जी रहे है। जहाँ आजकल के अभद्र समाज में कयी सारी अश्लीलता देखने को मिल रहा है।आजकल के बच्चे फिल्मी स्टार का अनुसरण कर रहे है जो पैंसो को कमाने के लिए अपने तन तक का व्यापार कर रहे है।

परंतु आज बहुत जरूरी हो गया है घर में बच्चों का संस्कार पक्ष मजबूत करने का, उन्हें बचपन से ही सही मूल्यों का ज्ञान दिया जाए। इस कच्ची उम्र में वे जो सीखते हैं, वह जीवन भर उनके साथ रहता है। इसका प्रभाव यह होगा की उनपर गलत चीजों का प्रभाव नहीं पढेगा। क्योंकि अगर आपसे प्रश्न पूछा जाए कि वर्तमान समाज की स्थिति के लिए जिम्मेदार कौन? फिर आपके पास कोई जवाब नहीं होगा।

Seven words of 7 rounds in marriage with images 

Seven words of 7 rounds in marriage

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Seven words of 7 rounds in marriage

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Tuesday, 28 December 2021

Benifits of Gayatri mantra गायत्री मंत्र जाप के चमत्कारी 14 फायदे अर्थ, महत्व,रहस्य, विशेषताएं एवं विस्तृत वर्णन

नमस्कार दोस्तों आज हम महा मंत्र Gayatri mantra secret in hindi के बारे में बात कर रहे है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार मंत्रों का जाप (Chanting Mantras) करने से व्यक्ति के अंदर सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।अच्छे विचारों का प्रभाव बडता है,ज्ञान और बुद्धि बडती है,तथा मन के सभी दुख, द्वेष, पाप, भय, शोक जैसे नकारात्मक चीजों का अंत हो जाता है। या ये कहें कि आत्मीय शान्ति का अनुभव होता है।  और साथ ही मानसिक तौर पर जागृत तथा सशक्त हो जाती है। 

Benifits of Gayatri mantra गायत्री मंत्र जाप के चमत्कारी 14 फायदे अर्थ, महत्व,रहस्य, विशेषताएं एवं विस्तृत वर्णन

आपको बता दें कि गायत्री मंत्र को सभी मंत्रों का सेतु भी कहा जाता है,क्योंकि इस Gayatri mantra में अद्वितीय शक्ति है, जो हमारे आंतरिक मन तथा आत्मा को पवित्र करके हमें परमात्मा से जाडता है। 

इस प्रभावशाली गायत्री मंत्र का  प्रत्येक दिन (Gayatri Mantra) का जाप करना चाहिए। इससे मन,शरीर से लेकर घर में भी सकारात्मक प्रभाव बना रहता है। इस गायत्री मंत्र जाप से आपको अद्भुत लाभ देखने को मिलेगा। फिर आपको पता चलेगा कि गायत्री मंत्र की शक्ति क्या है,गायत्री मंत्र के लाभ क्या है,गायत्री मंत्र के चमत्कार और नुकसान क्या है, गायत्री मंत्र का मानसिक जाप क्या है, महिलाओं के लिए गायत्री मंत्र कौन सा है,गायत्री मंत्र का अर्थ,भाव महत्व तथा महात्म क्या है, शिव,काम,ब्रह्मा गायत्री क्या है, गायत्री मंत्र की उत्पत्ति कहाँ से हुयी, आदि सवालों के लिए इस आर्टिकल में समाधान मिलेगा।

गायत्री मंत्र का महत्व व विशेषताएं/Significance and Features of Gayatri Mantra

गायत्री मंत्र का हिन्दू धर्म में बडा महत्व माना गया है। चारों वेदों से मिलकर बनें इस गायत्री मंत्र का उच्चारण करने से जीवन में खुशियों का संचार होने लगता है।ब्रह्मा,बिष्णु,महेश तथा समस्त ऋषि-मुनियों ने शक्तियां पाने के लिए गायत्री मंत्र का ही सहारा लिया था।वेदों की रचना 1500 ई.और सबसे प्राचीन वेद ऋग्वेद में ही गायत्री मंत्र का उल्लेख है।इसके उच्चारण और नियमित ध्यान साधना से व्यक्ति को अद्भुत लाब प्राप्त होते है,तथा परमार्थ हासिल करके अंत में मोक्ष प्राप्त करते है।गायत्री को ही सूर्य के आवाहन का मंत्र कहा जाता है। मंत्रोच्चारण के समय हमारी इन्द्रियां सूर्य से अद्वितीय शक्तियाँ प्राप्त करती है। 

ऐतरेय ब्राह्मण ग्रंथ मे कहा गया है -- 

``ज्ञानं त्रायते सा गायत्रीʼʼ 

अर्थात  - जो प्राणों की रक्षा करे वही गायत्री है,यह मंत्र भय दूर करता है और मानव की बुद्धि का विकास करता है।गायत्री ही उस बुद्धि का नाम है है व्यक्ति के अन्दर सद्भावना, अच्छे गुण,संस्कृति, संसकार,,नियम,परमार्थ और कल्याणकारी तत्वों का निर्माण कराती है।

इसीलिए कहा गया है --

``गीयते तत्वमनया गायत्रीतिʼʼ

अर्थात - जिस विवेक बुद्धि ऋतम्भरा प्रज्ञा से वास्तविक ज्ञान की अनुभूति होती है वही गायत्री है।

गायत्री मंत्र का अर्थ एवं भाव/Meaning of Gayatri Mantra

गायत्री मंत्र में कुल 14 शब्द है,और प्रत्येक शब्द की अलग व्याख्या है जो इस प्रकार है ---

1. ॐ     - ईश्वर,प्रणव,परमात्मा 
2. भूः     - प्राण स्वरूप (प्राण देने वाला)
3. भुवः    - दुखनाशक (दुखों को समाप्त करने वाला)
4. स्वः      - सुखस्वरूप (सख देने वाला)
5. तत्       - उस (परमात्मा)
6. सवितुः  - तेजस्वी (सूर्य के समान)
7. वरेण्यम्  - श्रेष्ठ (सबसे उत्तम)
8. भर्गः      - पापनाशक (पापों को हरने वाले)
9. देवस्य    - दिव्य (ईश्वर की अलौकिक शक्ति)
10. धीमही  - धारण करें (ध्यान धारणा)
11. धियो    - बुद्धि 
12. यो       - जो 
13. नः       - हमारी 
14. प्रचोदयात् - प्रेरित करें (हमें शक्ति दें)
गायत्री मंत्र का सम्पूर्ण अर्थ/full meaning of gayatri mantra
हम सभी उस प्राणस्वरूप,दुखनाशक, सुखस्वरूप, श्रेष्ठ, तेजस्वी, पापनाशक, देवस्वरूप,परमात्मा को हम अपने अन्तरमन अन्तः करण में धारण करें।  वह परमात्मा हमारी बुद्धि को सन्मार्ग प्रेरित करें।

गायत्री मंत्र के 14 चमत्कारी फायदे 

● गायत्री मंत्र जाप करने से हमारे शरीर में 110000 तरंगों का संचार शुरू होता है, जो कयी रोगों को समाप्त करता है।

● गायत्री मंत्र व्यक्ति के मस्तिष्क को साफ करके उसमें पवित्र विचारों का समावेश करता है, और शरीर तथा मन को आंतरिक रूप से शुद्धता प्रदान करता है।

● नियमित रूप से गायत्री मंत्र का जाप करने से अपने आज्ञा चक्र पर ऊर्जा का प्रभाव अनुभव कर पाएंगे,क्रोध,भय,अशान्ति आदि चीजें लुप्त हो जाएगी।

● गायत्री मंत्र जाप से व्यक्ति के अन्दर निरन्तरता आती है,वह भौतिक सुखों को भूलकर आध्यात्म से जुड जाता है।

● गायत्री मंत्र का प्रभाव सभी अनिवार्य अंगों को निर्देशित करता है तथा उनके सुचारू रूप से काम करने में मदद करता है।

● गायत्री मंत्र के प्रभाव से बुद्धि में वृद्धि होती है और आपकी क्रिएटिविटी बढती है,तथा आपकी कार्य के प्रति एकाग्रता भी बढती है।

● गायत्री मंत्र व्यक्ति को उसके कर्मों से मुक्त कराता है तथा मोक्ष प्रदान करने में मदत करता है।

● गायत्री मंत्र जाप के अनेकों फायदे है इससे समस्त भौतिक सुखों की प्राप्ति होती है तथा कुछ आध्यात्मिक लाभ ऐसे है जिनको शब्दों में बयां कर पाना सम्भव नहीं है। 

● गायत्री मंत्र के प्रभाव से तनाव तथा सभी मानसिक बीमारियां दूर होती है,तथा इन्द्रियों को बल मिलता है और सभी इन्द्रियां सक्रीय हो जाती है।

● गायत्री मंत्र जाप करने से शरीर का तापमान शुचारू रूप से कार्य करता है और ब्लड सर्कुलेशन सही कार्य करता है जो शरीर के गंदे विषाक्त बैक्टीरिया को बाहर फेंक देता है।

● गायत्री मंत्र में वह शक्ति है जो व्यक्ति को अच्छे गुण, कल्याणकारी तत्वों से भर देती है। जिससे मनुष्य को सद् गति प्रदान होती है वह अच्छे रास्ते का चयन करता है।

● गायत्री मंत्र जाप के प्रभाव से सांस सम्बन्धित परेशानियां दूर होती है,व्यक्ति के फेफड़े को साफ होकर मजबूती मिलती है तथा दिल सम्बन्धित सभी रोग दूर होते है।

● गायत्री मंत्र का प्रयोग हमेंशा परमार्थ के लिए होना चाहिए।क्योंकि जहाँ गायत्री का मंत्रोचार होता है वहाँ देवता भी सहायता करते है।

● गायत्री मंत्र के प्रभाव से देखने का हमारा नजरिया ही बदल जाता है,हमें हर जगह प्रेम,सद्भाव, आनंद ही नजर आता है तथा प्रकृति और जीवन की उपयोगिता मालूम होती है

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Sunday, 26 December 2021

Introduction to all 12 zodiac signs/ सभी 12 राशियों का सम्पूर्ण परिचय-जानकारी, गुण,स्वभाव, रंग,स्वामी,मित्र राशि,शुभ अंक-दिन-वार

नमस्कार दोस्तों हमारे ज्योतिष शास्त्र में राशियों का काफी महत्व है,क्योंकि राशि ही हमारा भाग्य बदलता है तथा इससे हमारी हर क्रियाकलाप,गुण,दोष आदि का पता चलता है। हर इंसान का स्वभाव उसकी राशि से संबंधित होता है। हर राशि के जातकों की अलग-अलग खासियत होती हैं,भाग्य तथा भविष्य होता है।इसीलिए आज हम एक साथ 12 राशियों का सम्पूर्ण परिचय, पहचान,गुण-दोष,व्यक्तित्व, स्वभाव,राशि स्वामी,राशि रत्न, राशि अंक,राशि शुभ रंग,राशि शुभ तिथि,वार,दिन, आदि एक ही साथ सभी 12 राशियों  फोटोज की जानकारी लेकर आए है। क्योंकि हर राशियों में आत्मविश्वास, ईमानदारी, जिद्दी प्रवृत्ति, दृढ़ प्रतिज्ञा अलग-अलग तत्वों से संबंधित होने की वजह से सबका स्वभाव भी अलग-अलग होता है। आइए जानते हैं सभी राशियों के स्वभाव के बारे में विस्तृत वर्णन से --

Introduction to all 12 zodiac signs/ सभी 12 राशियों का सम्पूर्ण परिचय-जानकारी, गुण,स्वभाव, रंग,स्वामी,मित्र राशि,शुभ अंक-दिन-वार,image

दोस्तों हम 12 राशियों का जीवन परिचय फोटोज के साथ में जानेंगे कि हर राशि अपने स्वभाव के कारण ही जातक पर प्रभाव डालती है। कुछ लोग बेहद गुस्सैल तो कुछ बेहद क्यूट और इनोसेंट होते है। आप अपनी तथा किसी की भी राशि से भी लोगों के गुण, स्वभाव और व्यक्तित्व के बारे में जान सकते है राशि से ही हम किसी की कमियां, खूबियां और उनके शौक तक के बारे में पता लगा सकते है। आइए राशि से जानते हैं जातकों के स्वभाव के बारे में पूरी जानकारी...

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