Monday, 13 May 2019

आत्मा क्या है/आत्मा का महत्व एवं स्वरूप

आत्मा क्या है ?
आत्मा का महत्व एवं स्वरूप

हमारे शास्त्रों मे वर्णित है कि हमारा यह शरीर आत्मा तथा पृथ्वी से बना है। इसके सारे गुण अवगुण हमारे शरीर मे विद्यमान है। दो अनुपम योग की साधना का योग यह शरीर अद्भुत है। जहां आत्मा अपरिवर्तन शील, अजन्मा, विकार रहित,तथा परमात्मा का स्वरूप माना जाता है।

वही प्रकृति विकार वाली तथा परिवर्तन शील है।
आत्मा कभी बदलती नही है वह हमेशा अंक ही स्वरूप रखती है। हालांकि इतना जरूर है कि वह शरीर ही बदलती है जिसे कि बदलना नही कहा जाता। लेकिन प्रकृति अपना रंग बदलती रहती है ।


हमारा यह शरीर पांच तत्वों से बना है। पृथ्वी, जल,वायु,अग्नि, आकाश और यही पांच तत्व समस्त सांसारिक वस्तुओं मे भी मौजूद है। जिस तरीके से शरीर भी पांच तत्वों से बना है लेकिन आत्मा का स्वरूप हर प्राणी मे एक ही है। प्रकृति मे जो बदलाव देखा जाता है वो इन्ही पांच तत्वों और तीन प्रमुख गुणों सत,रज, तम से ही परिवर्तन होता है।


विज्ञान भले ही इन तत्वों को समझ नही पाया और नाही इनके रहस्यों को समझ पाया लेकिन जहां विज्ञान की सोचने की छमता समाप्त होती है। वही से आध्यात्मिक सोच का निर्माण या विकास होता है।

आत्मा शरीर छोडने के बाद---

अक्सर हम यही सोचते है कि अगर आत्मा अमर है त जब वह शरीर छोडती है तो फिर क्या होता है। 18 पुराणों मे से एक गरूड पुराण मे कहा गया है कि जब आत्मा शरीर छोडती है।  तो यमराज के दूत उसे लेने के लिए आते है और जैसे उस प्राणी के कर्म होंगे उस हिसाब से वह उनके साथ कृत्य करते है।


इस पुराण मे कहा गया है कि मनुष्य के जैसे कर्म होगे उसी हिसाब से उसे दण्ड दिया जाता है , पुण्य आत्मा को स्वर्ग लोक तथा दुष्ट आत्मा को मृत्यु लोक मे दण्ड देते हुए ले जाया जाता है।  और केवल 24 घंटो मे ही उसके सभी पुण्य तथा पाप बताये जाते है।फिर 24 घंटो के बाद आत्मा को उसी घर मे छोड दिया जाता है , तेरह दिन के क्रिया कर्म के अनुसार तथा उसके कर्मों के अनुसार तेरह दिन बाद ही आत्मा नये शरीर मे प्रवेश करती है।


आत्मा की गतियां
कहावत है कि गती केवल दो ही होती है या तो सुगति होगी या दुर्गति। पुराणों के अनुसार आठ दिशायें है और इन्ही आठ दिशाओं मे समस्त शक्तियां विचरण करती है। और इसी को दो भागों मे यानी सुगति और दुर्गति मे बांटा  गया है। एक की गति सत्कर्म करने के बाद स्वर्ग लोक को प्राप्त होते है और दूसरा बुरे कर्म करने के बाद नर्क लोक को प्राप्त होते है।


अगती के चार मार्ग है। 

पहला क्षिणोदर्क--
यानी आत्मा इस मृत्यु लोक मे पुण्य आत्मा के रूप मे जन्म लेता है और संतों जैसा जैसा जीवन व्यतीत करता है।

दूसरा---
भूमोदर्क मे वह सुखी तथा ऐश्वर्य पूर्ण जीवन प्राप्त करता है।

तीसरी गति --- 
वह आत्मा नीच तथा पशु जीवन व्यतीत करता है।

चतुर्थ गति---
ह आत्मा कीट पतंगों मे जीवन धारण करती है।
इन्ही गलतियों के अनुसार चार लोक भी निर्धारित किये गये है। इसी के अनुरूप जैसा कर्म मनुष्य का होगा वैसा ही लोक वह निर्धारित करेगा। माना जाता है कि यहां किसी के साथ भी भेदभाव नही किया जाता। यहां न तो कोई छोटा है और ना ही कोई बडा सबको एक ही तराजू मे तोला जाता है।

ब्रह्मलोक

देवलोक


पितृलोक


नर्कलोक


        आत्मा का जीव मे प्रवेश
 आत्मा अजर अमर है वह कभी नष्ट नही होती , वह शरीर क्षीण होने पर नया शरीर धारण करती है। और ऐसे ही वह चौरासी लाख योनियों मे जन्म धारण करता है। मनुष्य योनी के बिना अन्य योनी मे तत्वज्ञान नही हो पाता। क्योकि मनुष्य ही उसकी उपयोगिता समझ सकता है। लाखों बार संसार मे जन्म लेने के बाद मनुष्य यदि पुण्य पुंज रहा तो जीवों को भी कभी मनुष्य जन्म से लाभ हो जाता है। यानी मनुष्य जीवन पाकर भी उसने उसकी सार्थकता सिद्ध न की या उसने पुरूषार्थ न कमाया या पशु जैसा जीवन व्यतीत किया तो फिर उसके होने का कोई अर्थ नही रह पाता वह बेकार का जीवन व्यतीत करता है और उस आत्मा को उसके अन्दर विद्यमान है उसे भी अपने पर खिन्न भाव आने लगते है कि उसने कैसे शरीर को चुना है।

इस प्रकार मोक्ष साधन स्वरूप  अप्राप्य मनुष्य योनी को प्राप्त कर अपने तारणहार का उपाय जो नही करता। जो इस जीवन को सकारात्मक भाव भक्ति  और सद कर्मों से अलंकृत नही करता। उससे अत्यधिक पापी और कौन हो सकता है। उसने तो इस मनुष्य जीवन को नष्ट करके अपने कर्मो को गलत दिशा की ओर ले जा दिया है उसके पुण्य कर्म भी पाप मे प्रवर्तित हो गये है। श्रेष्ठ मनुष्य योनी ,उत्तम वंश तथा शरीर प्राप्त करके भी जो अपने हित की बात नही सोचे उस आत्मा की रक्षा न कर सके वह ब्रह्मघाती ही होता है। यानी यह जीवन तो उपक्रम उपकार के लिए ही प्राप्त हुआ था। लेकिन जो अपने ही हित के बारे मे न सोच सके अपनी रक्षा न कर सके वह दूसरे प्राणी के बारे क्या सोच सकता है। वह ईश्वर का घोर विरोधी होता है। और उसे सजा अवश्य ही मिलती है।

पुरूषार्थ कमाने के लिए देह यानी शरीर का होना आवश्यक है। देह नही तो वह कैसे आत्मा की उपयोगिता सिद्ध कर सकता है। इसीलिए शरीर रूपी धन की रक्षा कर पुण्य कर्मो का साधन करे। इससे बढ़कर कोई दूसरा धन नही हो सकता जो ईश्वर के द्वारा बडे अच्छे कर्मो से प्राप्त हुआ है। बाकी का धन तो नश्वर है एक आत्मा ही अमरत्व को प्रदान है और उसे कभी दुखी न होने दे।

हमेशा आत्मा की रक्षा करे उसके हित के अनुसार ही कर्म करे क्योंकि आत्मा से ही सब होता है। सबकी सांसो की डोरी  आत्मा मे ही निहित है। इसकी रक्षा प्रयत्न से करनी चाहिए क्योंकि जिन्दगी बनी रहेगी तो सद्विचार के लिये अवसर प्राप्त होते रहेंगे। गया हुआ धन गांव खेत मकान सब वापस आ सकते है। लेकिन मनुष्य जीवन एक ही बार प्राप्त होता है। उसकी उपयोगिता को समझे और उसके अनुसार ही कर्म करे।

जीवात्मा का महत्व 

॥ आत्मा वा अरे दृषटव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितत्यो मैत्रेयी |

आत्मनो वा अरे दर्शनेन श्रवणेन मत्याविज्ञानेन इदं सर्वं विदितम् ||

मनुष्य एक ऐसा प्राणी है सर्वस्व ज्ञान के लिए जाना जाता है वह सभी प्राणी मे श्रेष्ठ वृद्धि व विवेक वाला कहा जाता है। लेकिन वह सब कुछ जानते हुए भी कुछ बातों को अनदेखा कर देता है।  वह भोग विलास के जीवन मे इस तरह रमेश जाता है कि उसे कुछ भी सही या गलत नही दिखता। वह अपने अन्दर बैठे उस दिव्य स्वरूप  आत्मा का अनुभव भी नही कर पाता कि यही आत्मा ईश्वर का स्वरूप है। जो मुझमे भी है और सभी प्राणियों मे भी है। इसकी भक्ति मे जो आनन्द है , वह संसार की किसी भी वस्तु मे नही है। इसका ज्ञान समस्त ज्ञानो से अलौकिक है जिसका कोई अनुयोग नही हो सकता।

मनुष्य सांसारिक विषय भोगोंको भोग-विलास करके तथा अपनी तीनो इच्छाओं, एशणाओं  पुत्रैषणा ,वित्तैष्णा , लोकैष्णा की प्राप्ति के लिए मनुष्य इस ओर अग्रसर होता है। हमारे शास्त्रो मे कहा गया है कि जब उस परम जीव के अन्दर आत्मा प्रवेश करती है तो उससे समस्त सवाल करती है कि हे जीव मै तुम्हारे अन्दर प्रवेश कर रहा हू . मेरी सार्थकता को समझना तथा मेरे मार्गदर्शन पर ही चलना कभी भी मेरे द्वारा बताए गए मार्गो का अनहित न करना या उसे झूठा साबित न करना क्योंकि मै एक ही हूं जो तुझमे भी हूं और संसार की समस्त प्राणी, वस्तु पदार्थ आदी मे भी हूं इसीलिए कभी भी किसी को कष्ट या किसी का अहित न करना अगर ऐसा हुआ तो समझो कि तुमने मुझे ही दुखी किया है। मनुष्य  उस दिव्य आत्मा को भरोसा दिलाता है। किन्तु जब उसका जन्म होता है तो वह भूल जाता है कि जिस ईश्वर ने मुझे जन्म दिया है। वह मेरे साथ है मेरे ही अन्दर है।और वह उस परम परमेश्वर परमात्मा को बाहरी जगत मे ढूंडता फिरता है ।

              अज्ञान वश ईश्वर की तलाश ---
 मनुष्य ज्ञानी होते हुए भी कितना ज्ञानी होता है। ईश्वर प्राप्ति के लिए वह अपना पूरा जीवन लगा दाता है। कोई उस ईश्वर को धर्म मे ढूंडते है। कि उसका नाम राम है,वह मन्दिर मे रहता है। और मुस्लिम कहता है कि वह तो मस्जिद मे रहता है हम उसे खुदा कहते है। कोई कहता है कि वह तो चर्च मे रहता है। जिसे हम गौड कहते है। और कोई कहता है कि वह तो गुरू के रूप मे है। मनुष्य ने उस ईश्वर को कयी रूपों मे विभक्त कर दिया हर कोई कहता है कि हमारा ईश्वर ही सबसे बडा है।लेकिन ईश्वर ने कभी अपने आप को रूपो मे विभक्त नही किया जबकि वह तो हर सांसो मे विचरण करता है उसका कोई स्वरूप नही है। वह तो निराकार है। और वह एक ही है। लेकिन हमारी मानसिकता इतनी धूमिल हो चुकी है कि हमे कुछ नही दिखता है।

कुछ लोग तो भगवान् को मन्दिरों मे ढूंडता है। उसकी पूजा करता है आराधना करता भंडारा लगाता है। लेकिन उसे कभी भगवान प्राप्त नही होते। कुछ लोग उस ईश्वर को पाने के लिए उपासना करते है फिर भी उनके दर्शन मात्र के लिए हम तरस जाते है। कुछ लोग तो अपने जीवन को उसी ईश्वर के नाम कर देते है। और वैराग्य धारण कर लेते है। फिर वह ईश्वर प्राप्त नही होते।और इसका यही कारण है कि हम जिस प्रकार से उन्हे पाने की कोशिश कर रहे है उससे तो मनुष्य अगर लाखों जन्म भी लेगा तो वह नही है प्राप्त होते सकता।

क्योकि कबीर दास जी ने भी कहा है कि---
खोजी होय तो तुरतै मिलिहौ, मै हर सांसों की सांस मे 
 ---अर्थात ईश्वर कहता है कि मुझे प्राप्त करना कठिन नही है। अगर तुम चाहो तो मुझे एक पल मे ही प्राप्त कर सकते हो। उसके लिए तुम्हे पहले अपने आप को जानना होगा कि मै कौन हूं अपने अन्दर झांक कर देखों मै तुम्हारे अन्दर ही हूं। और देखो कि क्यों तुम्हे यह मनुष्य जन्म मिला है इसकी सार्थकता को समझें मै तुम्हे दिख जाऊंगा।

आत्मा ही ब्रह्म है। जीवात्मा अपने-अपने कर्म भोग कर अन्त मे जब यह नाम रूप की लीला समाप्त हो जाती है। जब यह शरीर नष्ट हो जाता है। तो वह पुनः अपने परमात्मा रूप को धारण कर लेती है। उपनिषदों के अनुसार यदि मनुष्य मोक्ष प्राप्ति या ब्रह्म प्राप्ति या ईश्वर प्राप्ति करना चाहता है। तो उसे सभी सांसारिक विषय भोगों से दूर होना पडेगा, इन्हे त्यागना पडेगा। क्योंकि अन्न मे ही समस्त पाप छिपा हुआ है औरमनुष्य  अन्न के लिए ही पाप कर्म करता है। और मोक्ष प्राप्ति के लिए जीव को पुण्यात्मा बनना पडेगा।

जबतक उसकी इन्द्रियां बाहरी भोग-विलास से लिप्त है , तब तक वह ब्रह्म की प्राप्ति नही कर सकता। विषय भोग-विलास के ईश्वर विरोधी है। उन्हे तो मनुष्य का स्वच्छ हृदय जी जिता सकता है।

                   शान्ति का अनुभव ---
चाहे जीव हो या मनुष्य हर किसी को शान्ति की तलाश रहती है चाहे वह किसी भी मार्ग से प्राप्त हो वह उसकी परवाह नही करता। लेकिन कुमार्ग द्वारा प्राप्त हुयी शान्ति कुछ ही पल की होती है। और सन्मार्ग द्वारा प्राप्त की गयी शान्ति हमेशा सुखदायी होती है।

हमारे उपनिषदों मे कहा गया है कि जबतक माता-पिता, गुरू और अन्य आदरणीय व्यक्ति  खिन्न है तब तक मनुष्य को शान्ति नही मिल सकती। क्योंकि यही है जो मनुष्य के सच्चे साथी है बाकी तो लालसा वश ही प्रेम करते है।
अतः ---
मातृ देवो भवः , 
   पितृ देवो भवः , 
       आचार्य देवो भवः , 
          अतिथि देवो भवः,
 मनुष्य के मोक्ष का कारण भी यही है। अगर वह इनकी श्रद्धा तथा आस्था के साथ सेवा भक्ति करे तो उसे न तीर्थ जाने की जरूरत है और न ही ईश्वर को प्राप्त करने की जरूरत है क्योंकि यही ईश्वर का स्वरूप है। ज्ञान प्राप्त हो जाने पर मनुष्य के हृदय की ग्रंथियां खुल जाती है उसके अन्दर का अहं दूर हो जाता है,उसके अन्दर सकारात्मक भाव आने लगते है और वह खुद को और उस आत्मा को जानने लगता है। तभी मोक्ष को प्राप्त होता है।  उसके सारे संदेह दूर हो जाते है और उसके शुभ अशुभ कर्म भी नष्ट होते जाते है। और जब उसका शारीर स्वच्छ विचारों से भरता है तभी उसके शरीर मे ईश्वर का निवास होता है। यही आत्मा का रहस्य है।

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