Tuesday, 3 March 2020

गरूड पुराण के कुछ रहस्यमय सूत्र जो बदल दे किस्मत व जीवन? गरूड पुराण के ज्ञानवर्धक श्लोक

गरूड पुराण के कुछ रहस्यमय सूत्र जो बदल दे किस्मत व जीवन?
गरूड पुराण के ज्ञानवर्धक श्लोक

Some mysterious sutras of Garuda Purana that change luck and life
Enlightening verses of Garuda Purana


दोस्तों गरुड़ पुराण में जीवन, मुत्‍यु और कर्मफल के बारे में बहुत कुछ सीखने और पढ़ने को मिलता है। जीवन का रहस्य भी गरूड पुराण में ही छिपा है, इसी वजह से इस ज्ञान को प्राप्त करने के लिए घर के किसी सदस्य की मृत्यु के बाद उस समय हम जन्म-मृत्यु से जुड़े सभी सत्य जान सकें इसलिए इस समय गरुड़ पुराण का पाठ किया जाता है।Enlightening verses of Garuda Purana in hindi
अठारह पुराणों में 'गरुड़ महापुराण' का अपना एक विशेष महत्व है। क्योंकि इसके देव स्वयं विष्णु माने जाते हैं, इसीलिए इस पुराण को वैष्णव पुराण भी कहते है।
Garuda Puran Punishments List in Hindi भारतीय संस्कृति और सभ्यता के विकास में पुराणों का बहुत गहरा प्रभाव रहा है। यही हमें जीने की राह भी सिखाते है और हमारे मार्ग को भी अवरूद्ध होने से बचाते है।Enlightening verses of Garuda Purana in hindi कहते हैं कि पुराणों की रचना स्वयं ब्रह्मा जी ने सृष्टि के प्रथम और प्राचीनतम ग्रन्थ के रूप में की थी। ऐसी मान्यता है कि पुराण उचित और अनुचित का ज्ञान करवाकर मनुष्य को धर्म और नीति के अनुसार जीवन व्यतीत करने की प्रेरणा देते हैं।

The Garuda purana Hindu Mythology in hindi
 कलह, संताप, आरोप-प्रत्यारोप के जाल में अपने जीवन को उलझाकर कुंठा या निराशा का शिकार होता है। यही वजह है कि रोजमर्रा की जिंदगी में उठते-बैठते अक्सर किसी भी रूप में कभी अपनी खामियां दूसरों का जीवन, तो कभी दूसरों की कमियां हमारी जिंदगी पर बुरा असर डालती हैं।
इसीलिए हम आपके लिए ऐसे ही कुछ महत्वपूर्ण गरूड पुराण के श्लोक लेकर आए है जो आपके जीवन के द्वार खोल देंगे,जो आपकी दिशा खोलकर,आपको नयी राह दिखा देंगे।
इससे सम्बन्धित आपके लिए अन्य लेख,16 संस्कारों का वर्णन ,हिन्दू कैलेण्डर एवं व्रत त्यौहार ,द्वादशज्योर्लिंगों का विस्तृत वर्णन ,ऐसे प्रश्न जो जीवन की दिशा बदल दे,क्यों मनाई जातीं हैं शिवरात्रि ,हनुमानजी का जीवन दर्शन  जो आपका मार्गदर्शन करने मे सहायक होगा

गरूड पुराण श्लोक
1- ये हि पापरतास्तार्क्ष्य दयाधर्मविवर्जिताः।
   दुष्टसंगाश्च सच्छास्त्रसत्सङ्गतिपराडंमुखाः।।

अर्थात- हे मानव उस नरक में ऐसे-ऐसे मनुष्य जाते हैं,जो पापकर्म में लीन रहते है,तथा दया-धर्म से रहित है,दुष् पुरूषों के साथी है,शास्त्र तथा सत्संगति से पराङ्मुख है।

गरूड पुराण श्लोक
2- आत्मसंभाविताः स्तब्धा धनमानमदान्विताः ।
      आसुरं भावमापन्ना दैवीसम्पद् विवर्जिताः ।।

अर्थात- जो यह सोचता है कि वह बडा है,यह विचार कर ऐसे अभिमानी किसी को नमस्कार भी नही करते है,धन के मद से युक्त होकर असुरी सम्पदा को प्राप्त होते है, और दैवी सम्पदा से वर्जित रहते हैं।

गरूड पुराण श्लोक
3- अनेकचित्विभ्रान्ता मोहजालसमावृताः ।
    प्रसक्ताः कामभोगेषु पतन्ति नरकेऽसुचौ ।।

अर्थात- चित के चलने मात्र से विक्षिप्त है,मोह-जाल से आच्छादित होकर मात्र कामभोग में संलग्न है, ऐसे प्राणी अपवित्र नरक में जाते हैं।

गरूड पुराण श्लोक
4- ये नरा ज्ञानशीलाश्च ते यान्ति परमां गतिम् ।
    पापशीला नरा यान्ति दुखेन यमयातनाम ।।

अर्थात- जो पुरूष ज्ञानशील है,वे परमगति को प्राप्त होते है।जो प्राणी पापकर्म में प्रवृत्त है, वे तो दुख से यमयातना को भोगते है।

गरूड पुराण श्लोक
5- सुकृतं दुष्कृतं वाऽपि भुक्त्वा पूर्वं यथाऽर्जितम ।
     कर्मयोगात्तदा तस्य कश्चिद् व्याधिः प्रजायते ।।

अर्थात- सुकृत या दुष्कृत भोगकर अर्जित कर्म के कारण वृद्धावस्था में व्याधि उत्पन्न होती है ।

गरूड पुराण श्लोक
6- यत्राप्यजातनिर्वेदो म्रियमाणः स्वयम्भृतैः ।
     जरयोपात्तवैरूप्यो मरणाभिमुखो गृहे ।।

अर्थात- अन्तकाल में भी उसे वैराग्य उत्पन्न नहीं होता और जिसका उसने पालन किया था, वे पुत्रादि उसका पालन करने लगते हैं,और ऐसी अवस्था में उसे नेत्र से दिखता नहीं, कान से सुनाई नही देता ,दांत गिर जाते है अतः वह ऐसी अवस्था को प्राप्त हो मरणोन्मुख होते है।

गरूड पुराण श्लोक
7- वायुनोत्क्रमतोत्तारः कफसंरुद्धनाडिकः ।
     कासश्वासकृतायासः कण्ठे घुरघुरायते ।।

अर्थात- प्राणवायु निकलते समय आंखे उलट जातीषहै,कफ के अधिक होने से नाडी सब बन्द-सी हो जाती है,खांसी और श्वास के समय परिश्रम से कण्ठ में घुर-घुर शब्द होने लगता है।

गरूड पुराण श्लोक
8- एवं कुटम्बभरणे व्यापृतात्माऽजितेन्द्रियः ।
     म्रियते रुदतां स्वानामुरुवेदनयास्तधीः ।।

अर्थात- यावज्जीवन पर्यन्त कुटुम्बके भरण पोषण में आसक्तचित्त और अजितेन्द्रिय ऐसा पुरूष मरण समय की वेदना से मूर्छित हो बंधुजन के रुदन करते मृत्यु को प्राप्त होता है।

गरूड पुराण श्लोक
9- स्वस्थानाच्चलिते श्वासे कल्पाख्यो ह्यातुरक्षणः ।
     शतवृश्चिकदंष्द्स्य या पीडा साऽनुभूयते ।।

अर्थात- उस समय अपने स्थान से प्राण के चलने पर एक क्षण भी कल्पप्रमाण हो जाता है,और सौ बिच्छुओं के डंक मारने से जो वेदना होती है,ऐसी वेदना उस समय उसको होती है।

गरूड पुराण श्लोक
10- षडशीतिसहस्त्राणि योजनानां प्रमाणतः ।
        यममार्गस्य विस्तारो विना वैतरणीं खग ।।

अर्थात- यमलोक के मार्ग का प्रमाण हे गरुड, वैतरणी नदी को छोडकर छियासी हजार (86000) योजन है।।

गरूड पुराण श्लोक
11- अहन्यहनि वै प्रेतो योजनानां शतद्वयम् ।
      चत्वारिंशत तथा सप्त दिवारात्रेण गच्छति ।।

अर्थात- यमलोक के मार्ग में प्रति दिन प्रेत आत्मा दो सौ योजन चलता है,इस प्रकार से सैतालिस (47) दिन में दिन-रात चलकर यमलोक पहुँचता है।

गरूड पुराण श्लोक
12- अतीत्य क्रमशो मार्गे पुराणीमानि षोडश ।
        प्रयाति धर्मराजस्य भवनं पातकी जनः ।।

अर्थात- यमलोक के मार्ग में सोलह (16) पुयों को पार कर पापी जीव यमराज के घर जाता है।

यमलोक मार्ग में सोलह (16) पुरियों के नाम--

1- सौम्यपुर   2- सौरिपुर   3-नगेन्द्रभवन,                      4- गन्धर्वपुर    5- शैलागम     6- क्रौंचपुर                      7- क्रूरपुर                             8- विचित्रभवन               9- बह्वपदपुर  10- दुखदपुर          11- नानाक्रन्दनपुर          12- सुप्तभवन     13- रौद्रपुर      14- पयोवर्षणपुर         15- शीताढ्यपुर                   16- बहुभीतिपुर 

गरूड पुराण श्लोक
13- शतयोजनविस्तीर्णा पूयशोणितवाहिनी ।
       अस्थिवृन्दतटा दुर्गा मांसशीणितकर्दमा ।।
       अगाधा दुस्तरा पापैः केशशैवालदुर्गमा ।
       महाग्राहसमाकीर्णाशघोरपक्षिशतैर्वृता ।।

अर्थात- वैतरणी नदी सौ योजनविस्तार है,उसमें पूय और रूधिर बहते है ,हड्डी से भरा उसका तट है, मांस और शोणित के कर्दम से युक्त है। और बहुत ऊंची है, मनुष्य तैर नहीं सकते ,केशरूपी शैवाल से दुर्गम है। और बडे बडे मगरमच्छ से भरा है,और अति भयंकर हजारों पक्षियों से सम्पन्न है।

गरूड पुराण श्लोक
14- शोचन्तः स्वानि कर्माणि ग्लानिं गच्छति                   जन्तवः ।
       अतीव दुखसम्पन्नाः प्रयान्ति यममन्दिरम ।।

अर्थात-  यमलोक के मार्ग मे प्रेत अत्यन्त दुखी हो अपने किए हुए कर्मों को भोगते हुए पापी यमलोक में आते है।


गरूड पुराण श्लोक
15- तथाऽपि स व्रजन मार्गे पुत्र पौत्र ब्रुवन ।
       हा हेति प्ररुदन नित्यमनुतप्यति मन्दधीः ।।

अर्थात- मोह इतना है कि फिर भी मंदबुद्धि पुरुष पुत्र पौत्रों का स्मरण करता हुआ तथा हाहाकार करता और रोता हुआ पश्चाताप करता है।

गरूड पुराण श्लोक
16- मया न दत्तं न हुतं हुताशने तपो न तप्तं त्रिदशो         न पूजिताः ।
       न तकर्थसेवा विहिता विधानतो देहिन                     क्वचिन्निस्तर यत त्वया कृतम ।।

अर्थात- दान,अग्नि में हवन,तप,देवतावों की पूजा, विधि-विधान से तीर्थ की सेवा आदि नहि की । हे जीव तुमने निंदनीय कार्य किये है। अतः अब तुम अपने किए हुए दण्ड मार्ग को भोगो ,इस प्रकार आत्मा-आत्मा को सम्बोधन कर उपदेश करता है।

गरूड पुराण श्लोक
17- एवं विलप्य बहुशो संस्मरन पूर्वदैहिकम ।
       मानुषत्वं मम कुत इति क्रोशन प्रसर्पति ।।

अर्थात- हे गरूड प्रेत आत्मा अनेक प्रकार से विलाप कर पूर्वजन्म के किए हुए कर्मों को याद करता हुआ ,सोचने लगता है,कि अब मनुष्य जन्म कैसे प्राप्त होगा, यह सोचता हुआ प्रेत आत्मा जाता है।

गरूड पुराण श्लोक
18- क्व धनं क्व सुतो जाया? क्व सुह्रत? क्व च             बान्धवाः ।
       स्वकर्मोपार्जितं भोक्ता मूढ याहि चिरं पथि ।।

अर्थात- हे मूर्ख तू बेकार चिन्ता करता है, धन, भृत्य, पुत्र, स्त्री, बान्धव ,आदि तुम्हारे कोई भी नहीं।है,जीव अपने किये हुए कर्मों को अपने आप ही भोगता है।

गरूड पुराण श्लोक
19- आबालख्यातमार्गोऽयं नैव मर्त्य श्रुतस्त्वया ।
पुराणसम्भवं वाक्यं किं द्विजेभ्योऽपि न श्रुतम ।।

अर्थात- हे प्रेत आत्म यमलोक मार्ग को तो बालक पर्यन्त समी जानते है,इसको तुमने कैसे नही सुना और पुराणों के वचन भी ब्राह्मणों के पास तूने नहीं सुने क्योंकि पुराणों मे नरकादि का वर्णन बहुत प्रकार से किया है।

गरूड पुराण श्लोक
20- दानं वितरणं प्रोक्तं मुनिमिस्तत्त्वदर्शिभिः ।
       इयं सा तीर्यते यस्मात्स्माद्वैतरणी स्मृता ।।

अर्थात- वैतरणी की परिभाषा देते हुए कहा है कि तत्व के वेत्ता मुनियों ने दान को वितरण कहा है, जिससे यह तैरी जा सकती है----इसीलिए इसका नाम वैतरणी नदी है।

गरूड पुराण श्लोक
21- और्ध्वदैहिकदानानि वायुश्च कर्मभोगाय खेचर ।
यातनादेहमासाद्य सह याम्यैः प्रयाति च ।।
अर्थात- हे गरूड परलोक के निमित्त जिसने दान नही दिया ----वह कष्ट से तथा दृढबन्धन से बंधा हुआ यमलोक को जाता है।

गरूड पुराण श्लोक
22- भो भोः पापा दुराचारा अहङ्कारप्दूषिताः ।
       किमर्थमर्जितं पापं युष्माभिरविवेकिभी ।।

अर्थात- हे पापी आत्मा दुराचारी जीव अहंकार युक्त विवेक रहित होकर तुमने पाप रूप धन को इकट्ठा किसलिए किया? क्योंकि ईश्वर के निमित्त धन दान देना था। अपितु संचय नहीं करना था ।

गरूड पुराण श्लोक
23- कामक्रोधाद्युत्पन्नं सङ्गमेन च पापिनाम ।
       तत्पापं दुखदं मूढाः किमर्थं चरितं जना ।।

अर्थात- तुमने पापी पुरूषों की संगति से और काम-क्रोधादि से उत्पन्न हुए ऐसे दुख देने वाले पाप को तुमने किसके लिए किया? ।


गरूड पुराण श्लोक
24- ग्रासार्द्धमपि नो दत्तं न श्ववायसयोर्बलिम ।
       नमस्कृता नातिथयो न कृतं पितृतर्पणम् ।।

अर्थात- तुमने ग्रास मात्र अन्न दान नहीं किया ,तुमने बलिवैश्वदेवादि भी नही किया,अतिथियों को नमस्कार भी नही किया और पितृतर्पण भी नहीं किया।


गरूड पुराण श्लोक
26- नापि किञ्चित्कृतं तीर्थं पूजिता नैव देवता ।
       गृहाश्रमस्थितेनापि हन्तकारोऽपि नोद्धृतः ।।

अर्थात- गृहस्थ धर्म में रहते हुए भी तुमने कोई तीर्थ यात्रा नहीं की, न देवता की पूजा की तथा अहंकार को भी नहीं त्यागा ।


गरूड पुराण श्लोक
27- शुश्रूषिताश्च नो सन्तो भुङ्क्ष्व पापफलं स्वयं ।
यतस्त्वं धर्महीनोऽसि ततः सन्ताड्यसे भृ म ।।
अर्थात- तुमने संत पुरूषो की सेवा नहीं की अब फल भोगो, धर्म से रहित हो,अतः अनेक तरह की हम तुम्हारी ताडना करते है।


गरूड पुराण श्लोक
28- चतुराशीतिलक्षाणि नरकाः सन्ति खेचर ।
       तेषां मध्ये घोरतमा धौरेयास्त्वेकविंशतिः ।।

अर्थात- हे गरूड चौरासी लाख नरक होते है,इन्में इक्कीस प्रधान व भयानक नरक है, जो इस प्रकार है---
तामिस्त्र, लोहशंकु, महारौरव, शाल्मली,  रौरव, कुड्मल,  कालसूत्र,  पूतिमृत्तिक ,   संघात,  लोहितोद,  सविष,  संप्रतापन,  महानिरय,   काकोल,  संजीवन,  महापथ,  अवीचि,  अंधतामिस्त्र ,  कुंभीपाक,  संप्रतापन तथा तपन
ये प्रमुख 21 नरक है।



गरूड पुराण श्लोक
29- यास्तामिस्त्रान्धतामिस्त्ररौरवाद्याश्च यातनाः ।
       भुंक्ते नरो वा नारी वा मिथः संगेन निर्मिताः ।।

अर्थात- जो स्त्री तथा पुरूष परस्पर अधिक विषय सेवन से तामिस्त्र, अंधतामिस्त्र, रौरवादि नरक की यातना को भोगते है, इसलिए ऋतुदान और विषय-वासना में लिप्त नहीं होना चाहिए।



गरूड पुराण श्लोक
30- एवं कुटुम्बं बिभ्राण उदरम्भर एव वा ।
       विसृज्येहोभयं प्रेत्यभुङ्क्ते तत्फलमीदृशम ।।

अर्थात- अगर कोई पुरूष ईश्वर के निमित्त दान को न कर केवल कुटुम्ब का भरण-पोषण तथा अपने उदर को भरता है, ऐसे पुरूष कुटुम्ब को एवं अपनी देह को छोडकर परलोक में नरकादि के दुखों को भोगते है।



गरूड पुराण श्लोक
31- एकः प्रपद्यते ध्वान्तं हित्वेदं  स्वकलेवरम ।
       कुशलेतरपाथेयो भूतद्रोहेण यद्भृतम ।।
       दैवेनासादितं तस्य शमले निरये पुमान ।
       भुक्तें कुटुम्बपोष्स्य हृतद्रव्य इवातुरः ।।

अर्थात- जिसने अनेक प्राणियों से बैर-भाव करके अपने शरीर का पोषण किया, वह शरीर को त्यागकर कुटुम्ब का पोषण किया, इसी देवप्रेरित पाप का संचय करने से नरक में  जीव भोग  भोगता है और दुखी होता है।

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