Friday, 20 March 2020

हिन्दी व्याकरण छंद-- परिभाषा,अर्थ,महत्व,भेद-उदाहरण

हिन्दी व्याकरण छंद--
परिभाषा,अर्थ,महत्व,भेद-उदाहरण
Hindi grammar verses - definition, meaning, significance, distinction

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छंद का अर्थ(The meaning of the verse)

छंद का शाब्दिक अर्थ “बंधन” होता है। गद्य का नियम यदि व्याकरण है, तो छंद पद की रचना मानक है। गद्य या पद्य को रचनात्मक रूप देना।छंद शब्द 'छद्' धातु से बना है जिसका अर्थ है 'आह्लादित करना', 'खुश करना।' 'छंद का दूसरा नाम पिंगल भी है। इसका कारण यह है कि छंद-शास्त्र के आदि प्रणेता पिंगल नाम के ऋषि थे।


छंद की परिभाषा
(Chhand in Hindi)

1- जब वर्णों की संख्या, क्रम, मात्रा गणना, एवं यति-गति आदि नियम को ध्यान में रखकर जो शब्द योजना बनाई जाती है, उसे ही छंद कहते हैं।

2- अक्षर, अक्षरों की संख्या एवं क्रम, मात्रा, मात्रा गणना तथा यति- गति आदि से संबंधित विशिष्ट नियमों से नियोजित पद रचना “छंद” कहलाती है।

3- वर्णो या मात्राओं के नियमित संख्या के विन्यास से यदि आहाद पैदा हो, तो उसे छंद कहते है।

4- आह्मादित करे, प्रसन्न करे, वह छंद है (चन्दति हष्यति येन दीप्यते वा तच्छन्द) ।

उनके विचार से छंद 'चदि' धातु से निकला है। यास्क ने निरुक्त में 'छन्द' की व्युत्पत्ति 'छदि' धातु से मानी है जिसका अर्थ है 'संवरण या आच्छादन' (छन्दांसि छादनात्) ।
(महर्षि पाणिनी)


छंद का महत्व(
Importance of verses)

हिन्दी भाषा के गद्यात्मकपद्यात्मक में लय न हो तो काव्य में सुंदरता का अनुभव नहीं हो सकता। यही लय लाने के लिए कविता या गीत में वर्णों की संख्या और स्थान से सम्बंधित नियमों का निर्धारण किया जाता है, जो छंद के द्वारा होता है। छंद कोई नई नियमावली नहीं है। यह वेदों के समय भी प्रयुक्त होती थी, तभी तो वेदों के सभी सूत्र भी छंदबद्ध हैं।

चद’ धातु से उद्भवित ‘छंद’ [अर्थ = इच्छित तरीके से चलने वाला] का संगीत को संगीत बनने में बहुत योगदान है। यह हिंदी में भाव व्यक्त करने के सबसे सहज माध्यम, काव्य में सरसता और संगीतात्मकता जोड़कर उसे रुचिकर और मनोहर बनाता है।

सामान्य उदाहरण छंद को समझने में--- 

मेरे इस जीवन की है तू, सरस साधना कविता।

मेरे तरु की तू कुसुमित, प्रिय कल्पना लतिका।
मधुमय मेरे जीवन की प्रिय,है तू कल कामिनी।
मेरे कुंज कुटीर द्वार की, कोमल चरण–गामिनी।


छंद के अवयव(घटक)--Metaphor

हिन्दी भाषा में सामान्यता एक छंद चार चरणों से बनता है। हर चरण में मात्राओं की संख्या निश्चित होती है। पहला और तीसरा चरण विषम व दूसरा और चौथा चरण सम होता है। छंद के मुख्य अंग या अवयव कुछ इस प्रकार से हैं –

1- मात्रा, बोलने में लगने वाले समय के अनुसार लघु (ह्रस्व) या दीर्घ (गुरु) हो सकती है।

2- वर्ण छंदों में प्रयुक्त अक्षरों को कहते हैं।

3- यति से छंद में विराम कहाँ लेना है, इसका पता चलता है। (‘,’ , ‘।’ , ‘॥’, ‘-‘ , ‘!’ , ‘?’ ) आदि कुछ यति चिन्ह हैं।
तुक चरणों के अंत में उपस्थित वर्णों में समानता होने के कारण उत्पन्न होने वाली लयबद्धता से बनता है।
गति सही रहने से लय आती है, इसलिए छंद में इसका भी निर्धारण किया जाता है।

वर्णों के प्रकार (Character Types ---)

छंद में दो प्रकार के वर्ण होते हैं । (गुरु वर्ण और लघुवर्ण) । गुरु संकेत ' ऽ ' और लघुवर्ण का संकेत ( । )' है । छंद में वर्णों का लघु एवं गुरु होना उच्चारण आधारित है । संयुक्त अक्षरों के पूर्व का वर्ण लघु होते हुए भी गुरु माना जाता है ।

जैसे---
 अत्याधुनिक 
 5  5  ।  ।   । 

विषम चरण-- छंद के प्रथम और तीसरे चरणों को विषम चरण कहते हैं।

समचरण-- छंद के दूसरे और चौथे चरणों को सम चरण कहते हैं ।

मात्रिक छंद वह छंद है , जिसमें वर्णों का क्रम और संख्या एक समान नहीं हो , किन्तु मात्राएँ एक पद में समान हों । वर्णिक छंद में चारों चरणों में वर्ण क्रम और संख्या दोनों एक समान होते हैं ।

छंद के तीन उपभेद भी होते हैं --
1-  सम छंद-- चारों चरणों के लक्षण जिसमें एक समान हों ।
2- अर्ध सम छंद --
जिसके पहले और तीसरे चरण एक से हों और दूसरे एवं चौथे चरण एक से हों ।

3- विषम छंद-- 
जो सम छंद और अर्ध सम छंद से भिन्न हो । मात्राओं और वर्गों की संख्या के आधार पर छंदों को चार वर्गों में बाँटा गया है ---
1– साधारण छंद-- 
मात्रिक छन्दों में 32 मात्राओं तक के छन्द को ‘ साधारण छन्द ' कहा जाता है ।

2- दंडक छंद--
 32 मात्राओं से अधिक मात्रावाले छंदों को ' दंडक छंद , कहा जाता है।

3- साधारण वृत्त --
वर्णिक वृत्तों में 26 वर्ण तक के वृत्त ' साधारण वृत्त' कहलाते है।

4- दंडक वृत्त---
 वर्ण वृत्तो में 26 से अधिक वर्णो के वृत्त को ‘ दंडकर को ' दडक वृत्त ' कहा जाता है ।

दग्धाक्षर --

अशुभ या दग्धाक्षर को छंद के आदि में  नहीं रखा जाता है। 19 अक्षर अशुभ या दग्धाक्षर कहलाते है । (झ,ह,र,भ ,ष) को छंद शास्त्रियों ने अशुभ वर्ण माना है। इन वर्णो के प्रयोग से छंद की सुन्दरता घट जाती है ,। वर्ण छंद के आदि में गुरु होकर आए तो दोष नहीं माना जाता है ।

छंदोबद्ध रचनाओं की विशेषताएँ---
Characteristics of hierarchical compositions

छंदोबद्ध रचनाओं की निम्नलिखित विशेषताएँ होती हैं---

>  छंदोबद्ध रचनाएँ सुनने और सुनाने में मजेदार होती है ?
  छन्दोवद्ध रचनाएँ गेय होने के कारण स्मृति में अधिक दिनों तक बनी रहती है । ही कंठस्थ हो जाती हैं ।
> छन्दोबद्ध रचनाओं के स्मरण हो जाने पर तार्किक शक्ति बढ़ जाती है ।
 > गंभीर विषयों को छन्दों में लिखकर सुगम बनाया जा सकता है ।
> छंद का आधार रहने पर बड़े - बड़े विचारों को कम शब्दों में प्रकट किया जा सके ।

पारिभाषिक शब्द --

चरण-
छन्द की हर पंक्ति को ‘ चरण ' या ' पाद ' कहा जाता है ।

मात्रा-  किसी स्वर के उच्चारण में लगनेवाले समय को ' मात्रा ' कहते हैं ।

यति-  विराम को ही यति कहा जाता है । छन्द पढ़ते समय चरण के किसी खास स्थान कुछ देर के लिए विराम होता है , जहाँ ठहरा जाता है । इस ठहरने की क्रिया को ही ' यति ' कहते है ।
गति -- हर छन्द में एक प्रकार का प्रवाह होता है , जिससे उसमें माधुर्य आता है और एटा लयपूर्ण हो जाता है , इस पद - प्रवाह को ही ' गति ' कहते हैं ।

गण--
तीन वर्गों के समूह को ही ' गण ' कहा जाता है । वर्णिक छंद में वर्गों की गणना इसी गण के द्वारा होती है ।

गण के आठ प्रकार होते हैं ---
(1) यगण          (2) मगण 
(3) तगण          (4) रगण 
(5) जगण         (6) भगण 
(7) नगण          (8) सगण 

अब हम कुछ प्रमुख एवं महत्वपूर्ण छन्दों का अध्ययन करेंगे ---

1- दोहा 
लक्षण--  
प्रथम तीसरे पद सदा तेरह मात्रा योग । 
पद दूजे चौथे रखें , ग्यारह मात्रा लोग ।। 

अर्थात दोहे छंद में प्रथम और तृतीय चरणों में तेरह एवं दूसरे तथा चौथे चरणों में ग्यारह (11) होती हैं । मात्रा की शर्त होने के कारण यह मात्रिक छंद की श्रेणी में आता है । छंद में दूसरे एवं चौथे चरणों का तुक मिलता है ।

उदाहरण --
मेरी भव बाधा हरौ -----प्रथम चरण ( 13 मात्राएँ
राधा नागरि सोइ---  द्वितीय चरण  ( 11 मात्राएँ
जा तन की झाँईं परे -- तृतीय चरण ( 13 मात्राएँ ) 
श्याम हरित दुति होइ . . . . चतुर्थ चरण( 11 मात्राएँ

विशेष---- तुलसीदास , कबीरदास , वृन्द कवि , रहीम , जायसी आदि के दोहे मशहर है ।

2- चौपाई 
लक्षण--
चौपाई सोलह मात्राएँ , जगण तगण हो अन्त नहीं । 
सम कल पीछे सम , कल विषम बाद हो विषम । ।

अर्थात्-- चौपाई एक मात्रिक सम छंद है । इस छंद के प्रत्येक चरण में 16 मात्राएँ होती हैं । बण और तगण इसके अंत में नहीं होते । चरण के अंत में गुरु - लघु नहीं होता ।

उदाहरण--
सुखी मीन जे नीर अगाधा ।-------------( 16 मात्राएँ
जिमि हरिशरण न एकउ बाधा----------( 16 मात्राएँ ) 
मीन विलग जल से जब होती-----------( 16 मात्राएँ ) 
तडप तडप निज जीवन खोती ---------( 16 मात्राएँ )

3- सोरठा
लक्षण--
दोहा उल्टे सोरठा , ग्यारह तेरह मात्रा,
सम चरणों में जगण निषेध ,
ग्यारह मात्रा योग, प्रथम तीसरे पद रहे।
तेरह मात्रा लोग,दूजे चौथे पद रखे।।

अर्थात- यह अर्ध सम मात्रिक छंद है । यह दोहे का उल्टा होता होता है। इसके प्रथम एवं तृतीय चरण ग्यारह मात्रा योग , प्रथम तीसरे पद रहे । तेरह मात्रा लोग , दूजे चौथे पद रखे । आर्ट सम मात्रिक छंद है । यह दोह का उल्टा होता है । इसके प्रथम ॥ एवं द्वितीय - चतुर्थ चरणों में तेरह - तेरह मात्राएँ होती हैं । इसके में ग्यारह - ग्यारह मात्राएँ एवं द्वितीय - चतुर्थ चरणों में तेल से में जगण नहीं होता ।

उदाहरण ---
इस भव सागर बीच . . . . प्रथम चरण ( 11 मात्राएँ )
जीवन बुलबूला क्षणिक . .द्वितीय चरण ( 13 मात्राएँ
कर्म न कर तू नीच. . . .तृतीय चरण( 11 मात्राएँ
मानव नित सत्- संग कर।....चतुर्थ चरण( 13 मात्राएँ

4- सेला 
लक्षण--
रोला ग्यारह तेरह पै यति , पद चौबीस मात्रा धरिये । 

अर्थात् रोला में विषम पद में 4 + 4 + 3 या 3 + 3 + 2 + 3 और सम पद 3 + 2 + 4 + 4 या 3 + 2 + 3 + 3 + 2 इस तरह की मात्राएँ होती हैं । यह एक अर्द्ध सममात्रिक छंद है । इसके प्रत्येक चरण में 24 मात्राएँ होती हैं । 11 एवं 13 मात्राओं पर यति होती है । यह भी दोहे का उल्टा होता है ।

उदाहरण---
बाहर आया माल ---( 11 मात्राएँ
सेठ ने था -----------( 13 मात्राएँ
बंद जेल में हए ----- ( 11 मात्राएँ ) 
दवा बिन मुटापा ।---( 13 मात्राएँ )

5-- कुण्डलिया
 लक्षण-
कुंडलिया चौबीस मात्रा , दोहा रोला मिला बनाओ ।
आदि शब्द हो अन्त , अंत पद दोहा का रोला में लाओ । 

अर्थात्---
 एक दोहा और एक रोला मिलाने से यह छंद बन जाता है । दा कुडलिया का अंतिम शब्द होता है । यह विषम मात्रिक छंद है , जिसमें छह चाँपा मिटा 15 यह छेद बन जाता है । दोहे का प्रथम छंद है , जिसमें छह पंक्तियाँ होती है ।

विशेष---
हिन्दी साहित्य में गिरधर कवि की कुंडलियाँ काफी लोकप्रिय हुई हैं । 

6- हरिगीतिका-( 16 + 12 = 28 ) 
लक्षण--
हरिगीतिका सोलह बारह यति , 
हो पदांत लघु , गुरु , 
जहाँ पड़े चौकल होता है जगण निषिद्ध , 
अन्त रगण हो कर्ण मधुर । ।

यह एक सममात्रिक छन्द है । इसके प्रत्येक चरण में 28 मात्राएँ होती हैं । अंत में एक लघु और एक गुरु होता है।

उदाहरण--
संसार की समर स्थली में धीरता धारण करो । 
( 28 मात्राएँ  ) 
चलते हुए भी निज इष्ट पथ में संकटों से मत डरो ।
( 28 मात्राएँ ) 

जीते हुए भी मृतक - सम रहकर न केवल दिन भरो ।
वर वीर बनकर आप अपनी विघ्न - बाधाएँ हरो ।। 

7-उल्लाल 
लक्षण --
उल्लाल मात्रा पन्द्रह तेरह यदि दो दल हों चार चरण । 

अर्थात् -- इस मात्रिक छन्द में प्रथम एवं तृतीय चरणों 15 तथा द्वितीय एवं चतुर्थ चरणों में (13 मात्राएँ) होती हैं ।

8-कवित्त ( मनहरण ) 
लक्षण-
मनहर घनाक्षरी इकत्तीस वर्ण,
आठ आठ आठ सात , यति गुरु अन्त । 

अर्थात--  
यह एक सम वर्णिक छंद है। इसके प्रत्येक  चरण में इकत्तीस वर्ण होते हैं । 16 एवं 15 वर्णों पर यति होती है।चरणान्त में एक गुरू वर्ण अवश्य रहता है ।

कवित्त अनेक माने गये हैं ---
उदाहरण--
अनजान नर किया करता है खोट काम,
रोग - शोक भोगे , मले हाथ धीर छोड़ता । 
अपमान जान , आन , शान धूल मिली देख , 
भाग्य कोस , माथा ठोक , आश - दीप तोड़ता । । 
बन आप कारण , विधान बना रोपे पौध , 
बीज वो बबूलों के ही , खेत खूब गोड़ता । 
फल पाय कैसे भले , फूल - माल मिले कहाँ ,
जिन्दगी में रहा पाप - कंटकों को जोड़ता । ।

9-कवित्त ( घनाक्षरी ) 
लक्षण-
इसमें भी 31 वर्ण होते हैं । 16वें और 15वें वर्णों पर यति होती है । कवित्त में वर्णो के क्रम का कोई बंधन नहीं होता ।

उदाहरण--
इन्द्र जिमि जम्भ पर , बाडव सुअम्भ पर , ( 16 वर्ण
रावन सदम्भ पर रघुकुलराज हैं । ( 15 - वर्ण
पौन बारि बाह पर , सम्भु रतिनाह पर , 
ज्यों सहस्रबाहु पर राम द्विजराज हैं । 
दावा द्रुमदंड पर चीता मृग झुंड पर , भूषन वितुंड पर , जैसे मृग राज हैं । तेज तम अंस पर , कान्ह जिमि कंस पर , 
त्यों मलिच्छ वंस पर , सेर सिवराज हैं । । 

10- सवैया 
लक्षण--
यह एक सम वर्णिक छंद है । प्रत्येक चरण में 22 अक्षरों से लेकर 26 अक्षरों तक के छंदों को ' सवैया ' कहा जाता है । इसके चारों चरणों में तुक मिलता है । मत्तगयंद , दुर्मिल , सुमुखी , किरीट , वीर ( आल्हा ) आदि इसके अनेक रूप हैं ।

उदाहरण --      मत्तगयंद सवैय 
या लकुटी अरु कामरिया पर राज तिहँ पुर को तजि डारौं । 
आठहूँ , सिद्धि नवौ निधि को सुख नन्द की गाय चराय बिसारौं । 
रसखान कबौं इन नैनन सो ब्रज के बन बाग तड़ाग निहारौं ।
कोटिक हौं कलधौत के धाम करील के कुंजन ऊपर वारौं ।

वीर छंद
लक्षण --
वीर छंद सोलह वीर पन्द्रह हों , मात्रा गुरु लघु अंत बनाय । 
आल्हा जगनिक कवि ने गाया,भरे वीरता जिसे सुनाय।।

उदाहरण--
कर में गह करवाल घूमती , रानी बनी शक्ति साकार , 
सिंहवाहिनी , शत्रुघातिनी - सी करती थी अरि - संहार । 
अश्ववाहिनी , बाँध पीठ पै पुत्र , दौड़ती चारों ओर , 
अंग्रेजों के छक्के छूटे , दुश्मन का कुछ चलान जोर । । 

दुर्मित सवैया --
लक्षण--दुर्मिल सर्वया आठ सगण ।

उदाहरण ---

जग में दुखड़ा किससे कहिये , अपनी धुन में जग है जकड़ा । 
निज घात लगा , निज जाल बिछा , सब ही तकते बनके मकड़ा । । 
मत रो दुखड़ा , उखड़ा - उखड़ा मुखड़ा न बना , रह तू अकड़ा । 
बचते वह ही , जिसने धर धीर , यहाँ करुणाकर को पकड़ा ।

किरीट सवैया --
लक्षण--किरीट सवैया आठ भगण । 

उदाहरण --
आप भले तब होंय , कहें मत , 
“ है हम उत्तम और भले बस । 
" बोल भले नित ही कहिए सब ही अपनाय लगाय गले हँस । । 
ऐंठ बनें खुद आप खजूर न , 
धूप बचे वट - वृक्ष तले जस । 
दोपहरी विलमाय जु ,
“ छाँव भली ' कहता मुख से वह बेवश । । 

11--सारवती छंद 
लक्षण--
सारवती त्रिभगण गुरु अन्त । 

उदाहरण --
आग लगे , तब कूप खने । 
भूख लगे , तब बोय चने । । 
सूझ पड़े , जब काल खड़ा । 
मूरख है , उससे न बड़ा । ।

12- मुक्त छंद --
यह छंद न तो मात्रिक है न ही वर्णिक ; क्योंकि इसमें मात्रा या वर्ण का कोई बंधन नहीं हता है । काव्यशास्त्रीय परंपरा के छंदों के बंधन से मुक्त होने के कारण ही इसे ' मुक्त छंद ' कहा जाता है ।
आजकल मुक्त छंद ही ज्यादा प्रचलित हैं । 

उदाहरण --
साँप ( अज्ञेय ) 
साँप ! 
तुम सभ्य तो हुए नहीं , 
नगर में बसना भी तुम्हें नहीं आया । एक बात पूछूं
( उत्तर दोगे ? ) 
तब कैसे सीखा डसना ,
विष कहाँ पाया ?

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