Monday, 13 April 2020

एकलव्य का जीवन परिचय एवं प्रेरणादायक संवाद जो सफलता दिलाने मे है महत्वपूर्ण

एकलव्य का जीवन परिचय एवं प्रेरणादायक संवाद जो सफलता दिलाने मे है महत्वपूर्ण Introduction of Eklavya's life and inspiring dialogue which is important in bringing success
एकलव्य की भक्ति 

गुरू द्रोण के हाथ एकलव्य का ज्ञानवर्धक संवाद
द्रोणाचार्य = किसके शिष्य हो?

एकलव्य   = गुरु द्रोणाचार्य का।

द्रोणाचार्य  = किन्तु मेने तो तुम्हें कोई शिक्षा नहीं दी।

एकलव्य    = किन्तु मेने तो आप ही को गुरु माना है।

द्रोणाचार्य   = किसके पुत्र हो?

एकलव्य     = निषात् राज भिल्ल राजा का।

द्रोणाचार्य    = कौन वह जरासंघ की सेना का सेनापति?

एकलव्य      = जी हां गुरुदेव।

द्रोणाचार्य     = इतनी योग्यता प्राप्ति के बाद तुम कहां                             जाओगे?

एकलव्य       = मैं अपने पिता के साथ जरासंघ की सेना                         का नेतृत्व करूंगा। (सर्वप्रथम पांडवों की                         ओर से युद्ध मे भाग लेने की इच्छा प्रकट                         की थी )

द्रोणाचार्य      = तुम ये जानते हो जरासंघ मानवता का                            शत्रु है? नर पिशाच है ?

एकलव्य        = जी

एकलव्य का जीवन संक्षिप्त परिचय 
एकलव्य द्वापर युग में कौरव पांडवों के समकालीन थे । हरिवंश पुराण के अनुसार एकलव्य श्री कृष्ण के सगे चचेरे भाई थे जिनका पालन - पोषण निषादराज हिरण्यधनु ने पुत्रवत किया था । वनवासी जाति में पोषण होने के कारण बालक एकलव्य का जीवन वनांचलों में ही आखेट करते हुए व्यतीत हुआ था । धनुष बाण तथा शूल उनके प्रिय अस्त्र शस्त्र थे ।

हस्तिनापुर कुरु वंश की राजधानी थी । वहाँ गुरु द्रोणाचार्य कौरव पांडवों को शस्त्र और शास्त्र दोनों की शिक्षा दिया करते थे । एकलव्य ने गुरु द्रोणाचार्य की बड़ी प्रशंसा सुनी थी । धनुर्विद्या के इन सर्वश्रेष्ठ आचार्य के रूप में गुरु द्रोणाचार्य के दर्शनों की तीव्र अभिलाषा , एकलव्य के मन में थी ।

अत : एक दिन उसने साहसपूर्वक इन्द्रप्रस्थ में प्रवेश कर गुरु द्रोणाचार्य से निवेदन किया - -
" मैं श्री चरणों के समीप रहकर धनुर्विद्या की शिक्षा लेने आया हूँ । " 

 एकलव्य की प्रार्थना सुनकर गुरु द्रोण असमंजस की स्थिति में पड़ गए क्योकि उन्होंने भीष्म पितामह को वचन दे रखा था कि वे राजकुमारों के अतिरिक्त अन्य किसा को अस्त्र शस्त्र की शिक्षा नहीं देंगे । अतः अत्यंत वेदना के साथ उन्हें एकलव्य का शिष्यत्व प्रदान करने से मना करना पड़ा ।

एकलव्य ने तो मन ही मन द्रोणाचार्य को अपना गुरु मान लिया था । अत : उसने भूमिष्ट होकर , उन्हें प्रणाम करते हुए कहा - " भगवन , मैंने तो आपको गुरु मान लिया है । आपका आशीर्वाद मेरे ऊपर बना रहे , इतना ही मेरे लिए पर्याप्त है । " हस्तिनापुर से लौटकर एकलव्य ने वन में गुरु द्रोणाचार्य की मिट्टी की एक मूर्ति स्थापित की । उस दिन से वह प्रतिदिन नियमित रूप से मूर्ति को प्रणाम कर धनुर्विद्या का अभ्यास करने लगा । अपनी अविचल श्रद्धा , गुरु निश्चय तथा सतत अभ्यास के कारण एकलव्य महान धनुर्धर हो गया । एक बार द्रोणाचार्य अपने शिष्य पाण्डव और कौरवों को लेकर आखेट करने वन में गए । उनके साथ एक काला कुत्ता भी था ।

वह विचित्र वेशधारी वनवासी बालक एकलव्य को देखकर भौंकने लगा । एकलव्य की साधना में जब कुत्ते के भौंकने से बाधा पड़ने लगी तब उसने सात बाण चलाकर कुत्ते का मुख बन्द कर दिया । कुत्ता भागता हुआ राजकुमारों के पास पहुँचा । सबने बड़े आश्चर्य से देखा कि किसी ने कुत्ते को किसी प्रकार की चोट पहुँचाए बिना उसका मुख बाणों से भर दिया है । तब सब इस अदृश्य धनुर्धारी को खोजने निकले । एकलव्य के आश्रम में पहुँचे । वहाँ गुरु द्रोणाचार्य की मिट्टी की पूजा करते हुए एक आदिवासी किशोर को देखकर सब भौचक्के रह गए ।

गुरु द्रोणाचार्य को सशरीर साक्षात् अपने सामने देखकर एकलव्य ने उनके चरणों में दण्डवत किया ।
तब द्रोणाचार्य ने एकलव्य से पूछा - " बाण विद्या की इतनी उत्तम शिक्षा तुमने किससे प्राप्त की ? " 

हर एकलव्य ने गुरु की माटी की प्रतिमा की ओर इंगित करते हुए कहा - " यह सब आपकी ही कृपा का फल है । " आपका ही स्मरण कर मैं इतने दिनों से धनुर्विद्या का एकाकी अभ्यास करता रहा है । - तब अर्जुन ने कहा - गुरुदेव आपने तो मुझसे कहा था कि आप पृथ्वी पर सबसे - बड़ा धनुर्धर मुझे ही बनाएँगे । पर आपका यह वनवासी शिष्य तो बाण विद्या में मुझसे भी अधिक प्रवीण है । अर्जुन के प्रश्न का उत्तर न देकर द्रोणाचार्य ने एकलव्य से पूछा - जब तुमने मुझे गुरु मान लिया है तो क्या गुरु दक्षिणा नहीं दोगे ? एकलव्य को गुरु का यह वचन सुनकर अपना आभास हुआ ।

उसने हर्ष - विह्वल होकर कहा "
आज्ञा करें गुरुवर ।

" द्रोणाचार्य ने तब एकलव्य से गुरुदक्षिणा में उसके दाहिने हाथ का अंगूठा मांग लिया । 

दाहिने हाथ के अंगूठे पर ही धनुर्विद्या का सारा कौशल निर्भर रहता है । इसे एकलव्य जानता  था । पर गुरु ने दक्षिणा में जब उसे ही माँगा था तो फिर किसी बात का संकोच क्यों ?

 इतने दिनों की साधना , इतना परिश्रम , इतनी बड़ी महत्वाकांक्षा सब व्यर्थ हुई जा रही थी । पर उस वीर गुरुभक्त वनवासी किशोर के चेहरे पर दु : ख की एक रेखा तक प्रकट नहीं हुई । उसने तत्काल अगूंठा काटकर गुरु द्रोणाचार्य के चरणों में रख दिया । - एकलव्य की एकान्तिक साधना और गुरु भक्ति का आदर्श भारतीय शिक्षा के आचरण का एक अनुपम और अद्भुत उदाहरण है ।

~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
अन्य सम्बन्धित लेख साहित्य--------

0 comments: