Tuesday, 14 April 2020

जगद्गुरु शंकराचार्य जी का जीवन परिचय एवं कथावस्तु व जीवनोपयोगी विचार,Jagadguru Shankaracharya

जगद्गुरु शंकराचार्य जी का जीवन परिचय एवं कथावस्तु व जीवनोपयोगी विचार
Life introduction and storytelling and useful thoughts of Jagadguru Shankaracharya
Jagadguru Sankaracharya

शंकराचार्य जी का संक्षिप्त परिचय 
Brief introduction of Shankaracharya ji
gyansadhna.com
जन्म            = शंकर 9वीं सदी
जन्म स्थान   = कलाड़ी, चेर साम्राज्य
वर्तमान में केरल, भारत, भट्ट ब्राह्मण

मृत्यु तिथि      =  32 वर्ष की उम्र में
केदारनाथ, पाल साम्राज्य
वर्तमान में उत्तराखंड, भारत

गुरु/शिक्षक     = आचार्य गोविन्द भगवत्पाद

दर्शन           = अद्वैत वेदांत

खिताब/सम्मान  = शिवावतार, आदिगुरु, श्रीमज्जगदगुरु, धर्मचक्रप्रवर्तक

धर्म      =  हिन्दू
दर्शन    = अद्वैत वेदांत
राष्ट्रीयता    =  भारतीय

जीवन परिचय व कथावस्तु 
Life introduction and story

भारत के प्रसिद्ध गुरू शंकराचार्य के भरत के ।ई नहीं अपितु जगद्गुरू (पूरे संसार) के शंकराचार्य जगद्गुरू है। शंकराचार्य का बचपन का नाम शंकर था । इनका जन्म विक्रम संवत् 845 वि . तदनुसार ईस्वी सन् 788 को वैशाख शुक्ल पंचमी की दोपहर में हुआ । इनके पिता का नाम पंडित शिवगुरू तथा माता का नाम आर्याम्बा देवी था ।

बालक शंकर शैशवकाल से ही असाधारण प्रतिभा के धनी थे । उनकी बुद्धि अत्यन्त तीक्ष्ण थी और अपनी असामान्य स्मरण शाका के कारण वे सर्वत्र चर्चा का विषय बनते । कहा जाता है कि तीन वर्ष की आयु मे बालक शंकर ने मलयालम साहित्य के ग्रन्थों का पाठ प्रारम्भ कर दिया था - जब ये तीन वर्ष के थे उस समय इनके पिता श्री शिवगुरू का देहान्त हा कारण परिवार पर भारी आर्थिक संकट आ पड़ा । परन्तु बालक शंकर ने बडे साहस के साथ इस विषम स्थिति का सामना किया ।

केरल के कालड़ी ग्राम में , नम्बूद्री ब्राह्मणों के वंश में उत्पन्न यह बाल विलक्षण थ । यह घर पर ही शास्त्रों का अध्ययन करने लगा । वह आत्मा ओर प्रवृत्त हुआ । आत्मान्वेषण ने इसे संन्यास की ओर प्रेरित किया पर माता
आर्याम्बा भला इसकी अनुमति कैसे देती।

कहा जाता है कि शंकर एक दिन माताश्री के साथ नदी में स्नान करने गए । वहां एक मगर ने इनका पाँव पकड़ लिया । पानी गले तक आ गया और शंकर के जीवित बचने की आशा जाती रही ।
तब शंकर ने माता आर्याम्बा से कहा--- 
" यदि तुम संन्यास लेने की अनुमति दो तो शायद यह मगर मुझे जीवन दान दे दे । "

विवश होकर बाता अर्याम्बा ने शंकर को संन्यास की अनुमति दे दी । तब मगर ने उनके पाँव छोड़े । इस समय बालक शंकर की आयु केवल आठ वर्ष की थी । अब वे गुरु की खोज में निकल पड़े । ध्यान में इन्हें योगी गोविन्दपाद के दर्शन हुए । गोविन्दपाद नर्मदाखण्ड के ओंकारेश्वर तीर्थ के पास एक गुफा में साधाना कर रहे थे । ओंकारेश्वर इन्दौर से साठ - सत्तर किलोमीटर दूर द्वादश ज्योर्तिलिंगों में से एक है । गुरु गोविन्दपाद की गुफा आज भी वहां देखी जा सकती है ।

 केरल से पैदल चलकर जंगल , वन , पर्वतों को पार कर शंकर गुरू के पास पहुँचे । योगी गोविन्दपाद ने उन्हें दीक्षा दी और वेद - वेदांगों का ज्ञान दिया । इन्हीं दिनों काशी में एक वृहद् धर्म सभा का आयोजन था । गुरूजी की आज्ञा से शंकराचार्य आकाश मार्ग से वहाँ गए और उन्होंने धर्मसभा में वैदिक धर्म की पुनः प्रतिष्ठा की । । काशी जाकर ये भगवान् विश्वनाथ की उपासना करने लगे । कहा जाता है कि भगवान् शंकर ने इन्हें अद्वैत तथा शुद्ध वैदिक धर्म का पुनर्प्रचार करने की आज्ञा दी । यह समय बौद्ध मत के पतन का था । शून्यवाद के कारण लोग बड़े भ्रमित थे ।

तांत्रिक उपासना तथा अन्धविश्वास की बहुलता के कारण समाज में ढोंगी तथा पाखण्डियों का बोल - बाला था । नाना प्रकार के मतों , सम्प्रदायों तथा पन्थों के कुहासे में डूबा देश , पतन की ओर अग्रसर हो रहा था । ऐसे सांस्कृतिक संक्रांति काल में अनेक कुप्रथाएँ समाज में फैल गई थीं । शंकराचार्य ने अद्वैत वेदान्त दर्शन प्रतिपादन कर , समाज को एक नई दिशा दी ।

 शंकराचार्य ने सद्धर्म की स्थापना तथा वैचारिक वितण्डावाद को दूर करने के लिए दिग्विजय का समारम्भ किया । वे स्थान - स्थान पर भ्रमण करते तथा वहां के विद्वानों को शास्त्रार्थ के लिए आह्वान करते । बौद्ध दार्शनिकों द्वारा वैदिक धर्म के कर्मकाण्ड पर लगाए गए आक्षेपों का मुंहतोड़ उत्तर देते । इस प्रकार उन्होंने पूरे भारत में घूम - घूम कर वैदिक सनातन धर्म की पुनर्स्थापना की । प्रियाग जाकर उन्होंने कुमारिलभट्ट से भेंट की । कुमारिलभट्ट भी आर्य धर्म क प्रचार कर रहे थे पर जब शंकराचार्य उनसे मिलने पहुँचे तो कुमारिलभट्ट अपने शरी को अग्नि समर्पित कर रहे थे । उनकी सलाह से शंकराचार्य ने मंडन मिश्र एवं उनके पत्नी भारती को शास्त्रार्थ में पराजित कर अपना शिष्य बनाया । यही मंडन मिः कालान्तर में सुरेश्वराचार्य कहलाए ।

शंकराचार्य के द्वारा किए गये अभिन्न प्रयास--
1- शंकराचार्य जी ने सम्पूर्ण भारत का भ्रमण किया ।
2- शंकराचार्य जी ने कश्मीर से प्राग ज्योतिष ज्ञान एवं भक्ति की निर्मल धारा प्रवाहित की । 
3- शंकराचार्य जी ने राष्ट्रीय एकात्मता की स्थापना के लिए उन्होंने देश के चार कोनों पर चार धाम तथा द्वादश ज्योतिर्लिंगों की पुनर्स्थापना की ।
4-  शंकराचार्य जी के द्वारा स्थापित चार धाम - बद्रीनाथ , जगन्नाथ , द्वारकापुरी तथा रामेश्वरम का जीर्णोद्धार किया गया । 

5- शंकराचार्य जी ने इन चार धामों के पास ही चार पीठों की स्थापना कर ।
शंकराचार्य जी ने हर पीठ में शंकराचार्य नियुक्त किए । ये चार पीठ हैं - ज्योतिपीठ , गोवर्धन पीठ , शारदा पीक पंगेरीपीठ । 

6- आज भी इन पीठों में शंकराचार्यों की परम्परा चली आ रही है । कांची में यद्यपि पहली पीठ स्थापित की थी परन्तु शृंगेरी पीठ अधिक प्रसिद्ध है । विभिन्न सम्प्रदायों एवं पन्थों द्वारा प्रचलित विभिन्न - उपासना पद्धतियों में समन्वय स्थापित करने के लिए उन्होंने मन्दिरों में पंचायतन पूजा का प्रारम्भ किया । 

7- पंचायतन का अर्थ था , विष्णु , शिव , दुर्गा गणेश एवं आदित्य ( सूर्योपासना ) की सम्मिलित पूजा ।

8- राष्ट्रीय एकीकरण के लिए उन्होंने नासिक , प्रयाग और हरिद्वार में प्रत्येक बारह वर्ष के क्रम से कुम्भ मेले का प्रारम्भ किया ।

9-  कुम्भ मेले में सभी सम्प्रदायों और पन्थों को अपने - अपने विचार प्रकट करने की छूट रहती है । 

10- आज भी कुम्भ मेले में जाति , भाषा , पन्थ का भेदभाव भूलकर करोड़ों भारतीय एकत्रित होकर विविधता में एकात्मता का प्रदर्शन करते हैं । 

11- पञ्चदेव उपासना वाला यह मत स्मार्त कहलाता है क्योंकि स्मृतियों के अनुसार यह सब के लिए निर्धारित है । आज भी साधारण सनातन धर्मी इसी स्मार्त मत को मानता है । 

12- उत्तरकाशी में साधनारत रहकर शंकराचार्य ने ब्रह्मसूत्र तथा बारह उपनिषदों एवं भगवद्गीता पर भाष्य लिखे । 

13- इसके अतिरिक्त उन्होंने विवेक चूडामणि , प्रबोध सुधाकर , पंचीकरण , प्रपंचसार तंत्र , मनीषपंचक आदि महत्वपूर्ण ग्रन्थों की रचना की । 

उनके द्वारा प्रमाणित दर्शन अद्वैत वेदान्त कहलाता है । वेदान्त की संकल्पना को स्पष्ट करते हुए वे लिखते हैं ---
आत्मानां पूरितं सर्वम महाकल्पाम्बुना यथा । । 

इसका आशय है - महाप्रलय के जलोच्छवास द्वारा जैसे समग्र संसार व्याप्त रहता है , वैसे ही आत्मा से सारा विश्व आच्छादित रहता है । जिस समय शंकराचार्य का प्रादुर्भाव हुआ उस समय वैदिक धर्म लुप्तप्राय हो रहा था ।

इस कठिन अवसर पर शंकर ने वैदिक धर्म का पुनरूद्धार किया । उन्होंने जिस सिद्धान्त की स्थापना की उस पर संसार के बडे - बडे विद्वान और विचारक भी आज तक मंत्र मग्ध हैं - यह मत है अद्वैत वेदान्त जिसमें मानव जीवन का परम लक्ष्य बताया गया है - अज्ञान से मुक्ति पाकर अपने वास्तविक स्वरूप का ज्ञान प्राप्त करना ।

निष्कर्ष--
भारत को एक राष्ट्र के रूप में धार्मिक सांस्कृतिक रूप से एकताबद्ध करने वाल जगद्गुरू शंकराचार्य ने मात्र बत्तीस वर्ष की अल्पायु में सनातन धर्म की पुनर्प्रतिष्ठा का समाधि धारण कर इस लोक का परित्याग किया ।उनका मत
 कि जीवन ईश्वर ने सिर्फ भोगों के लिए ही नही दिया है,अपितु समस्त जीवों के उत्थान के लिए दिया है यही सनातन धर्म है और यही मानवता धर्म है।
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