Tuesday, 18 January 2022

Mangalvar vrat Katha मंगलवार व्रत की कथा ,महत्व, विधि विधान एवं उद्यापन के नियम

 जय श्री कृष्ण दोस्तों आज हम Mangalvar Vrat : मंगलवार (Mangalvar) व्रत की सम्पूर्ण जानकारी लेकर आए है। मंगलवार को हनुमान जी का व्रत (Hanuman ji ka Vrat) रखा जाता है।और हनुमान जी ही कलियुग के पृथ्वी देवता माने जाते हैं। मंगलवार के दिन हनुमान जी का व्रत रखने से उनकी असीम कृपा प्राप्त होती है। इसका फल भी जल्दी मिलथा है,और ये व्रत मान सम्मान, आत्मबल, साहस और पुरुषार्थ को बढ़ाता है।तथा विशेषकर  संतान प्राप्ति के लिए भी मंगलवार का व्रत किया जाता है। इस व्रत के फलस्वरूप पापों को मुक्ति मिलती है।और व्यक्ति के अन्दर का भय समाप्त हो जाता है। इसलिये मान्यता है कि मंगलवार को हनुमान की पूजा उपासना करने सभी प्रकार के संकट दूर हो जाते हैं।

Mangalvar vrat Katha मंगलवार व्रत की कथा ,महत्व, विधि विधान एवं उद्यापन के नियम

मंगलवार व्रत का महत्व - मंगल के सब दोष दूर होकर शरीर के विकार नष्ट होते हैं । राज सभा में सम्मान प्राप्त होता है । समाज का या राजा का भय दूर होकर जीवन में प्रसन्नता आ जाती है।

मंगल व्रत की विधि-विधान व नियम

मंगलदेव की शान्ति और उनकी विशेष कृपा प्राप्ति हेतु यह व्रत लगाकर बारह या इक्कीस मंगलवार तक किया जाता है । हनुमानजी के समान ही मंगलदेव को लाल रंग की वस्तुएँ और लाल फूल प्रिय हैं । अतः पूजा में लाल रंग की वस्तुओं का प्रयोग तो करें ही , स्वयं भी लाल रंग के वस्त्र धारण करें । तिल , सरसों अथवा सूखे आँवले का चूर्ण बनाकर रख लें और स्नान से पूर्व इस चूर्ण की सम्पूर्ण शरीर पर मालिश करें । स्नान के पश्चात् लाल रंग के वस्त्र धारण करके पूजा स्थल को पवित्र करने के बाद कुमकुम अर्थात् रोली में रंगे चावलों से अष्टदल कमल बनाकर उस पर लाल वस्त्र भी बिछाएँ । सोने की बनी हुई मंगलदेव की मूर्ति अथवा ताम्रपत्र पर अंकित मंगल यंत्र को काँसे के कटोरे में रखकर इसे लाल वस्त्र पर रख दीजिए । आटे का चार बत्तियों वाला दीपक बनाकर घी भरकर जलाएँ और सभी पूजन सामग्री से मंगलदेव की विधिवत पूजा करें । मंगलदेव की सभी वस्तुएँ अर्पित करते समय ' ॐ भौमाय : नमः ' मंत्र का उच्चारण किया जाता है । मंगलवार का व्रत करने वाले को दिन - रात में एक बार गेहूँ और गुड़ का भोजन करना चाहिए ।

मंगलवार व्रत की उद्यापन विधि- 

बीस मंगलवार तक व्रत और पूजन करने के पश्चात् इक्कीसवें मंगलवार को किया जाता है इस व्रत का उद्यापन । इस दिन भी व्रत रखा जाता है और मंगलदेव की पूजा आराधना की जाती है । उद्यापनमें इक्कीस ब्राह्मणों को मिष्ठानों का भोजन कराने के बाद यथायोग्य दक्षिणा देने तथा मुख्य पुजारी को मंगलदेव की मूर्ति सहित पूजन में प्रयुक्त होने वाली सभी सामग्री देने का शास्त्रीय विधान है । यदि एक बार के व्रत से मंगलदेव का प्रकोप शांत नहीं होता तब यह व्रत दूसरी और तीसरी बार भी किया जाता है ।

मंगलवार व्रत की कथा/mangalvar vrat katha 

एक बुढ़िया थी वह मंगल देवता को अपना इष्ट देवता मानकर सदैव मंगलवार का व्रत और मंगल देव का पूजन किया करती थी। उसका एक पुत्र था जो मंगलवार को उत्पन्न हुआ था इस कारण उसको मांगलिया के नाम से बोला करती थी ।एक दिन मंगल देवता उसकी श्रद्धा को देखने के लिए उसके घर साधु का रूप बनाकर आए और द्वार पर आवाज दी । बुढ़िया ने कहा- महाराज क्या आज्ञा है ? साधु कहने लगा कि बहुत भूख लगी है , भोजन बनाना है इसके लिए तू थोड़ी सी पृथ्वी दे तो तेरा पुण्य होगा । यह सुन बुढ़िया ने कहा - महाराज आज मंगलवार की व्रती हूँ इसलिए मैं चौंका नहीं लगा सकती । कहो तो जल का छिड़काव कर दूँ । 

उस पर भोजन बना लें । साधु कहने लगा कि मैं गोबर से लिपे चौके पर ही खाना बनाता हूँ । बुढ़िया ने कहा पृथ्वी लीपने के सिवाय और कोई सेवा हो तो सब कुछ करने के वास्ते उद्यत हूँ । तब साधु ने कहा - सोच - समझ कर उत्तर दो मैं जो कुछ भी कहूँ सब तुमको करना होगा । बुढ़िया कहने लगी कि महाराज पृथ्वी लीपने के अलावा जो भी आज्ञा करेंगे , उसका पालन अवश्य करूँगी । 

बुढ़िया ने ऐसा तीन बार वचन दे दिया । तब साधु कहने लगा कि तू अपने लड़के को बुलाकर औंधा लिटा दें , मैं उसकी पीठ पर भोजन बनाऊँगा । - साधु की बात सुनकर बुढ़िया चुप हो गई । तब साधु ने कहा कि बुला लड़के को , अब सोच - विचार क्या करती है ? बुढ़िया मंगलिया , मंगलिया कहकर पुकारने लगी । थोड़ी देर बाद लड़का आ गया । बुढ़िया ने कहा- बेटे तुझको बाबाजी बुलाते हैं । 

लड़के -- ने बाबाजी से पूछा- क्या आज्ञा है महाराज ? बाबाजी ने कहा कि जाओ अपनी माताजी को बुला लाओ । जब माता आ गई तो साधु ने कहा कि तू ही इसको लिटा दो बुढ़िया ने मंगल देवता का स्मरण करते हुए लड़के को औंधा लिटा दिया और पीठ पर अंगीठी रख दी । कहने लगी - महाराज अब जो कुछ आपको करना है कीजिए , मैं जाकर अपना काम करती हूँ । साधु ने लड़के की पीठ पर रखी अंगीठी में आग जलाई और उस पर भोजन बनाया । जब भोजन बन चुका तो साधु ने बुढ़िया से कहा कि अब अपने लड़के को बुलाओ वह भी आकर भोग ले जाए ।

बुढ़िया कहने लगी कि यह कैसे आश्चर्य की बात है कि उसकी पीठ पर आपने आग जलाई और उसी को प्रसाद के लिए बुलाते हैं । क्या यह सम्भव है कि अब भी आप उसको जीवित समझते हैं । आप कृपा करके उसका स्मरण भी मुझको न कराइए और भोग लगाकर जहाँ जाना हो जाइए । साधु के अत्यंत आग्रह करने पर बुढ़िया ने ज्यों ही मंगलिया कहकर आवाज लगाई त्यों ही लड़का एक ओर से दौड़ता हुआ आ गया । साधु ने लड़के को प्रसाद दिया और कहा कि माई तेरा व्रत सफल हो गया । तेरे हृदय में दया है और अपने इष्ट देव में अटल श्रद्धा है । इसके कारण तुमको कभी कोई कष्ट नहीं होगा ।

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