Friday, 7 January 2022

Somvar Vrat Katha सोमवार व्रत कथा महत्व एवं पूजन विधि

नमस्कार दोस्तों भगवान शिव तथा माता पार्वती का आशीर्वाद प्राप्त करने के सर्वोत्तम उपाय है सोमवार का व्रत। इस व्रत से भक्त की सभी मनोकामनाएं पूर्ण हो जाती है, क्योंकि भोलेनाथ थोडी सी भक्ति से भी प्रसन्न हो जाते है। इनकी भक्ति से व्यक्ति अकाल मृत्यु से भी वापस आ सकता है तथा औरतें पुत्र प्राप्ति तथा संतान प्राप्ति के लिए सोमवार का व्रत रखती है। कन्याएं अच्छा वर पाने की कामना से सोमवार व्रत को रखती है। शिव की कृपा से भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण हो जाती है। 

Somvar Vrat Katha सोमवार व्रत कथा महत्व एवं पूजन विधि 

सोमवार व्रत की विधि

सोमवार का व्रत सामान्यतः दिन के तीसरे पहर तक होता है। धार्मिक ग्रन्थों के अनुसार सोमवार व्रत में व्यक्ति को प्रातः स्नान करके शिव जी को जल और बेल पत्र चढ़ाना चाहिए तथा शिव-गौरी की पूजा करनी चाहिए।इस व्रत मे फलाहार तथा पारण का कोई महत्व नहीं है।  शिव पूजन के बाद सोमवार व्रत कथा सुननी चाहिए इसके बाद केवल एक समय ही भोजन करना चाहिए। शास्त्रों के अनुसार  सोमवार व्रत तीन प्रकार का होता है प्रति सोमवार व्रत, सौम्य प्रदोष व्रत और सोलह सोमवार का व्रत, इन सभी व्रतों के लिए एक ही विधि-विधान होती है। और तीनों व्रतों का अलग-अलग महत्व है।

सोमवार व्रत कथा/Somvar vrat katha 

एक बहुत धनी सेठ था , जिसके पास सम्पूर्ण वैभव था । परन्तु उसे एक दुःख था कि उसके कोई पुत्र नहीं था । वह इसी सोच में दिन - रात चिन्तित रहता था । वह पुत्र की प्राप्ति के लिए सोमवार को शंकरजी का व्रत और पूजन करता था । सायंकाल शंकरजी के मंदिर में दीपक जलाता था । उसकी भक्ति को देखकर एक समय श्री पार्वती जी ने शंकरजी से कहा कि महाराज ! यह सेठ आपका अनन्य भक्त है । हमेशा आपका व्रत और पूजन बड़ी श्रद्धा पूर्वक करता है आपको इसकी मनोकामना पूर्ण करनी चाहिए । शंकरजी ने पार्वती जी से कहा यह संसार कर्म क्षेत्र है । किसान खेत में जैसे बीज बोयेगा उसे फल वैसे ही प्राप्त होंगे । 

पार्वतीजी ने अत्यन्त विनम्र पूर्वक कहा कि जब यह आपका भक्त है और इसे कोई दुःख है तो आपको अवश्य ही इसके दुःख को दूर करना चाहिए । क्योंकि आपने अपने भक्तों पर हमेशा कृपा की है । उनके दुःखों को दूर किया है । अगर आप ऐसा करेंगे तो मनुष्य ही आपकी सेवा , व्रत , कथा , पूजन करेंगे । पार्वतीजी का आग्रह सुनकर शंकरजी कहने लगे कि हे पार्वतीजी ! उसके कोई पुत्र नहीं है इसी कारण वह दुःखी रहता है । उसके भाग्य में पुत्र नहीं है । तब भी मैं इसको पुत्र की प्राप्ति का वर देता हूँ । लेकिन वह पुत्र ११ वर्ष तक ही जीवित रहेगा , तत्पश्चात वह मृत्यु को प्राप्त होगा । इससे अधिक और मैं कुछ नहीं कर सकता । यह सभी बात वह सेठ सुन रहा था । इससे उसे न प्रसन्नता हुई और न ही दुःख हुआ । वह पहले की भाँति शंकरजी का सोमवार व्रत तथा पूजन करता . रहा । कुछ समय व्यतीत हो जाने पर सेठ की स्त्री गर्भवती हुई तथा दसवें महीने उसके गर्भ से बहुत सुन्दर पुत्र उत्पन्न हुआ । 

सेठ के घर में बहुत खुशियाँ मनाई गई । लेकिन सेठ ने उसकी उम्र केवल ११ वर्ष जानकर अधिक खुशी प्रकट नहीं की । न किसी को भेद बताया , जब वह बालक दस वर्ष का हो गया तो उसकी माँ ने उसके पिता से विवाह के लिए कहा । लेकिन वह सेठ कहने लगा कि इसका विवाह अभी नहीं करूँगा । इसे काशी पढ़ने भेजूँगा । उस सेठ ने अपने साले ( लड़के के मामा ) को बुलाकर उसे बहुत सारा धन देकर कहा कि तुम इस लड़के को काशी पढ़ने के लिए ले जाओ और रास्ते में जिस तरफ भी जाओ यज्ञ करना तथा ब्राह्मणों को भोजन कराते जाना । वह दोनों मामा और भानजे रास्ते में सब जगह यज्ञ कराते तथा ब्राह्मणों को भोजन कराते जा रहे थे । उनको जाते समय रास्ते में एक शहर पड़ा । उस शहर के राजा की कन्या का विवाह तथा दूसरा राजा का लड़का जो विवाह के लिए बारात लेकर आया था एक आँख से काना था । 

लड़के के पिता को यह बड़ी चिन्ता थी कि कहीं वर को देख कन्या के माता - पिता शादी में किसी प्रकार की अड़चन पैदा न कर दें । इस कारण जब उसने बहुत सुन्दर सेठ के लड़के को देखा तो मन में विचार किया कि क्यों न इस लड़के से वर का काम लिया जावे । ऐसा सोचकर राजा ने लड़के तथा उसके मामा से कहा तो वह राजी हो गये । तब सेठ के लड़के को स्नान आदि कराकर वर के कपड़े पहनाये तथा घोड़ी पर चढ़ाकर कन्या के यहाँ ले गये । वर के पिता ने सोचा कि विवाह कार्य भी इसी लड़के से करा दिया जावे तो क्या बुराई है ऐसा विचार कर उन्होंने उसके मामा से कहा कि अगर आप फेरों और कन्यादान का काम भी करा दें तो आपकी बड़ी कृपा होगी । इसके बदले में हम आपको बहुत सारा धन दे देंगे ।

उन्होंने यह स्वीकार कर लिया और उसने विवाह तथा फेरों का कार्य भी कर दिया । फेरों के बाद जब लड़का जाने लगा तो उसने राजकुमारी की चुंदरी के पल्ले पर लिख दिया कि तेरा विवाह तो मेरे साथ हुआ है लेकिन जिस राजकुमार के साथ तुम्हें भेजेंगे वह एक आँख से काना है और मैं काशीजी पढ़ने जा रहा हूँ । राजकुमारी ने जब अपनी चुंदरी पर इस प्रकार लिखा पाया तो उसने राजकुमार के साथ जाने से इन्कार कर दिया और कहा कि यह मेरा पति नहीं है । मेरा विवाह इसके साथ नहीं हुआ है । वह काशी पढ़ने गया है । राजकुमारी के माता - पिता ने अपनी कन्या विदा नहीं की और बारात वापिस चली गई । उधर सेठ का लड़का और उसका मामा काशी पहुँच गये तथा वहाँ जाकर उन्होंने यज्ञ आदि धर्म कार्य करने तथा लड़के ने • पढ़ना शुरू कर दिया ।

जब लड़के की आयु ११ वर्ष की हो गई तब उस दिन उन्होंने यज्ञ का आयोजन किया था उसी समय लड़के ने अपने मामाजी से कहा कि मामाजी आज मेरी तबियत ठीक नहीं है । मामा ने कहा कि तुम अन्दर जाकर सो जाओ । लड़का अन्दर जाकर सो गया और सोते ही उसके प्राण निकल गये । जब उसके मामा ने जाकर देखा तो वह मुर्दा पड़ा है । उसको बहुत दुःख हुआ लेकिन उसने सोचा कि अगर रोना पीटना शुरू कर दूँगा तो यज्ञ का कार्य अधूरा रह जावेगा । अतः उसने शीघ्र ही यज्ञ का कार्य पूर्ण कराया तथा ब्राह्मणों के जाने के पश्चात् रोना - पीटना शुरू कर दिया । संयोगवश उसी समय शंकरजी तथा पार्वतीजी उधर से जा रहे थे । जब उन्होंने जोर जोर से रोने - पीटने की आवाज सुनी तो पार्वतीजी शंकरजी से आग्रह करके उसके पास ले गई और सुन्दर बालक को मरा हुआ देखकर कहने लगीं कि यह तो उसी सेठ का लड़का है जो आपके वरदान से हुआ था । शंकरजी ने पार्वतीजी से कहा कि इसकी उम्र इतनी ही थी . जो समाप्त हो चुकी है ।

 पार्वतीजी ने शंकरजी से कहा कि महाराज 1 कृपा करके इस बालक की आयु और बढ़ा दो वरना इसके माता - पिता तड़प - तड़प कर मर जावेंगे । पार्वतीजी के इस प्रकार के बार - बार के आग्रह करने पर शंकरजी ने उसको वरदान दिया और शंकरजी की कृपा से बालक जीवित हो गया । शंकर पार्वती कैलाश को चले गये तथा वह लड़का एवं उसका मामा उसी भाँति यज्ञ कराते हुए अपने घर की ओर चल पड़े । रास्ते में उसी शहर में आये जहाँ उस लड़के का विवाह हुआ था । वहाँ पहुँचकर जब उन्होंने यज्ञ आरम्भ कर दिया तो उस लड़के के श्वसुर ने उसको पहचान लिया और अपने महल में लाकर उसकी बड़ी खातिरदारी की । साथ ही बहुत सारा धन दिया तथा दासियों के सहित बड़े आदर सत्कार के साथ अपनी लड़की को उसके साथ विदा कर दिया । जब वह सब अपने शहर के नजदीक आये तो उसके मामा ने कहा कि पहले मैं तुम्हारे घर जाकर आने की खबर कर आता हूँ ।

उस समय उसके माता - पिता घर की छत पर बैठे हुए थे और उन्होंने यह प्रण कर रखा था कि यदि हमारा लड़का सकुशल घर लौट आया तो राजी - खुशी नीचे आ जावेंगे वरना छत से गिरकर अपने प्राण दे देंगे । इतने में उसके मामा ने आकर यह समाचार दिया कि आपका लड़का आ गया है । लेकिन उन्हें विश्वास न हुआ तो उसके मामा ने शपथपूर्वक कहा कि आपका लड़का अपनी पत्नी तथा बहुत सारा धन साथ लेकर आया है । तब सेठ ने उसका बड़े प्रसन्नतापूर्वक स्वागत किया और घर ले आये वहाँ वह बड़ी प्रसन्नता के साथ रहने लगे । इस प्रकार जो भी सोमवार के व्रत को धारण करता है अथवा इस कथा को पढ़ता या सुनता है । उसके सभी दुःख दूर होकर उसकी सभी मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं।

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