Thursday, 9 March 2023

Consonant varn in hindi व्यञ्जन वर्ण, अल्पप्राण, महाप्राण, घोष वर्ण अर्थ परिभाषा व भेद

Consonant varn in hindi व्यञ्जन वर्ण, अल्पप्राण, महाप्राण, घोष वर्ण अर्थ परिभाषा व भेद

परिभाषा-Definition

जिन ध्वनियों का उच्चारण करते समय  मुख से निकलने वाली वायू में रुक्वाट उत्पन्न होती है, उन्हें व्यंजन वर्ण कहते है।

व्यंजन वर्ण के मुख्य रूप से तीन भेद हैं - 

1- स्पर्श वर्ण 

2- अंत:स्थ 

3- ऊष्म वर्ण 

1- स्पर्श व्यंजन- 

वर्णा के उच्चारण करते समय वायु मुख के भिन्न-भिन्न स्थानों से टकराकर ध्वनि उत्पन्न करती है। इसलिए जब वायु जिह्वा द्वारा मुख के भिन्न-भिन्न उच्चारण स्थानों का स्पर्श करते हुये ध्वनि निकलती है उन्ने स्पर्श व्यंजन कहते है।

स्पर्श व्यञ्जन 25 इस प्रकार से है--

कवर्ग  = क् ख् ग् घ् ङ्

चवर्ग  = च् छ् ज् झ् ञ्

टवर्ग   = ट् ठ् ड् ढ् ण्

तवर्ग   = त् थ् द् ध् न् 

पवर्ग   = प् फ् ब् भ् म्

2- अंतःस्थ व्यंजन - 

अंतःस्थ व्यंजन वे वर्ण हैं, जिनका उच्चारण करते समय जिह्वा विशेष सक्रिय नहीं रहती है। स्पर्श तथा ऊष्म व्यंजनो की मध्यवर्ती  स्थति में होने के कारण इन्हें अंतःस्थ व्यंजन कहते है।

ये चार प्रकार के होते है--- य् र् ल् व्

3- ऊष्म व्यंजन- 

जिन व्यंजनों का उच्चरण्यन समय श्वास वायु मुख के विशेष स्थान को छूने के कारण कुछ गर्म हो जाती है वे ऊष्म व्यंजन कहलाते हैं। 

इनकी संख्या चार होती है---- श् ष् स् ह्

4- अयोग्यवाह वर्ण

 'अनुस्वार' और विसर्ग 'अयोग्यवाह वर्ण हैं। ये स्वर एवं व्यंजन दोनों के बोले जाते है। 

जैसे- अं - अः  (स्वर द्वारा) 

        कं -  कः (व्यंजन द्वारा)

उच्चरण में वायु-प्रक्षेप की दृष्टि के आधार पर वर्णों के दो प्रकार हैं--- 

अल्पप्ररण -

ऐसे वर्ण, जिनके उच्चारण में वायू की सामान्य मात्रा रहती है, जैसी ध्वनि का बहुत ही होती है। इसके अंतर्गत सभी स्वर वर्ण तथा वर्गों के प्रथम, तृतीय और पंचम वर्ण, अनुस्वार और अन्तःस्थ व्यंजन आते हैं। 

इनकी कुल संख्या 11 + 15 + 1+ 4 = 31 है।

महाप्राण -

महाप्राण ध्वनियों के उच्चारण में वायु की सामान्य मात्रा रहती है।और हकार जैसी ध्वनि बहुत ही कम होती है। इसके अंतर्गत सभी स्वर वर्ण सभी वर्गों के द्वितीय, चतुर्थ व्यंजन विसर्ग और ऊष्म व्यंजन आते है।

इनकी कुल संख्या 11+10 + 1 + 4 = 26

स्वर-तंत्री के आधार पर वर्णों को दो अन्य भागों में बांटा गया है

1- घोष या सघोष वर्ण

घोष ध्वनियों के उच्चारण में स्वर-तंत्रियां आपस में मिल जाती है और वायु धक्का देते बाहर निकालती हैं। फलत: झंकृति पैदा होती है। इसके अंतर्गत सभी स्वर वर्ण, सभी वर्गों के तृतीय, चतर्थ और पंचम वर्ण, अन्तःस्थ और ह आते हैं। 

2- अघोष वर्ण

अघोष वर्ण के उच्चारण में स्वर-तंत्रियं परस्पर नहीं मिलती। फलत वायु, आसनी से निकल जाती है। इस वार्ग में वर्गों के प्रथम और द्वितीय वर्ण और अधिक तीनों श, ष, स, आते है।

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