Sunday 25 June 2023

Complete Chanakya Neeti In Hindi सम्पूर्ण चाणक्य नीति 17 अध्यायों का सार एक साथ

 
Complete Chanakya Neeti In Hindi सम्पूर्ण चाणक्य नीति 17 अध्यायों का सार एक साथ
     

नमस्कार दोस्तों आज आपको आचार्य चाणक्य जी के नीतियों के बारे में बताने वाले है।Chanakya Neeti In Hindi आज हम सम्पूर्ण चाणक्य नीति, 17 अध्यायों का सार एक साथ आपको बताने वाले है। ,Chanakya Niti all Chapter in hindi,chanakya niti in hindi, 17 अध्यायों का निष्कर्ष एक साथ Chanakya Neeti all chapter Hindi meme, Complete Chanakya Niti, Read the complete Chanakya Neeti In hindi.चाणक्य नीति, चाणक्य सूत्र, चाणक्य जीवनी, आचार्य चाणक्य, हिंदी पुस्तक - चाणक्य नीति, आचर्य चाणक्य की महान पुस्तक चाणक्य नीति हिंदी में, जो सम्पूर्ण विश्व में प्रसिद्ध है और जिसे हर कोई व्यक्ति अपने जीवन में फाॅलो करता है। "चाणक्य नीति" आचार्य चाणक्य की नीतियों का अद्भुत संग्रह है,श्लोक है, सुविचार है, अनमोल वचन है, व प्रेरणादायक सूत्र है जो आज भी उतना ही प्रासंगिक है, जितना वह दो हजार चार सौ साल पहले था, जब इसे लिखा गया था ।तो आइए आज हम इन्हें पढकर अपने जीवन में उतारने का प्रयास करेंगे और आर्टिकल अच्छा लगे तो कमेन्ट अवश्य करें।

Chanakya Niti (Chapter-1) प्रथम अध्याय का सार

अध्याय के प्रारंभ में चाणक्य उस गृहस्थ को सुखी बताते हैं, जिसके घर में मंगल कार्य होते रहते हैं। जिसकी संतान बुद्धिमान हो, पत्नी मधुरभाषिणी हो, जिसने सत्कर्मों से धन की प्राप्ति की हो, जिसके मित्र समय पर उसका साथ देने वाले हों, नौकर आदि उसकी आज्ञा का पालन करने वाले हों, जहां अतिथियों का स्वागत-सत्कार होता हो, जो गृहस्थ नित-नियम से प्रभु की उपासना करता हो और जिस घर में प्रतिदिन श्रेष्ठ, स्वादिष्ट भोजन बनता हो, ऐसी गृहस्थी ही प्रशंसनीय होती है अर्थात ऐसा गृहस्थ सदैव सुखी रहता है।

दान का महत्व बताते हुए चाणक्य ने अनेक स्थानों पर कहा है कि दान देने से धन की कमी नहीं होती। हां, योग्य और विद्वान ब्राह्मणों को ही दान देना चाहिए, क्योंकि ऐसे व्यक्ति को दिया हुआ दान कई गुना होकर मिलता है। असल में देखा जाए तो धन का दान करना तो इसलिए भी लाभप्रद है क्योंकि ऐसा करके व्यक्ति यश और पुण्य की प्राप्ति करता है, जो धन की अपेक्षा बहुत ज्यादा समय तक रहने वाली है।इस संसार में नित्य ऐसे दुष्कर्म होते हैं, जिनसे किसी के नष्ट होने का भय-सा बनारहता है। जिस व्यक्ति ने अपने हाथों से कभी दान नहीं दिया, कानों से कभी शास्त्र वचन नहींसुने, आंखों से कभी सज्जन व्यक्तियों के दर्शन नहीं किए और जो कभी तीर्थों पर भी नहीं
गया, चाणक्य कहते हैं कि ऐसा जीवन व्यर्थ है।
होनी बड़ी प्रबल होती है, यह बात सभी जानते हैं। अपनी होनी अथवा भाग्य के कारण करील के वृक्ष पर पत्ते नहीं होते तो इसके लिए वसंत को दोषी नहीं माना जा सकता, यदि उल्लू को दिन में दिखाई नहीं देता तो उसमें सूर्य का क्या अपराध है, इसलिए जो कुछ भाग्य में लिखा है, उसके प्रति किसी को दोष देना उचित नहीं। एक बहुत ही उपयुक्त उदाहरण देकर आचार्य चाणक्य ने कहा है कि दुष्ट व्यक्ति के पास रहने से भी सज्जन व्यक्ति अपनी सज्जनता का त्याग नहीं करता, जबकि सज्जन की संगति में आकर दुष्ट सज्जन बन सकता है। सज्जनों के संबंध में आचार्य का कहना है कि उनके दर्शनमात्र से पुण्य फल की प्राप्ति होती है, परंतु जहां कोई सज्जन पुरुष नहीं होता, वहां का जीवन भी विष के उस कीड़े के समान होता है, जो विष में ही उत्पन्न होता है और विष में ही मरता है। इस श्लोक का आशय यह भी हो सकता है कि जिस प्रकार विष का कीड़ा विष से अप्रभावी रहता है, उसी प्रकार दुष्टों में रहने पर भी सज्जन व्यक्ति दुर्गुणों से कोसों मील दूर रहता है।
चाणक्य ने आदर्श घर उसे माना है, जहां ब्राह्मणों का सम्मान होता है, उनकी सेवा होती है, जहां वेद मंत्रों और शास्त्रों की ध्वनि गूंजती रहती है और अग्निहोत्र से वातावरण सुगंधित रहता है। जहां यह सब नहीं होता, ऐसा धर्म-कर्म रहित घर श्मशान के समान होता है। ऐसे घर में नकारात्मक ऊर्जा का निवास हो जाता है। चाणक्य कहते हैं कि मनुष्य को चाहिए अन्य बातों की ओर से ध्यान हटाकर अपना मन धर्म के कार्यों में लगाए ।
आचार्य के अनुसार, जो व्यक्ति दूसरों की स्त्री को माता के समान देखता है, दूसरे के धन को तुच्छ समझता है और सब प्राणियों को अपने समान मानता है, सदैव धर्म में लगा रहता है, कटु वचन नहीं बोलता, जिसमें दान की प्रवृत्ति होती है, मित्रों से जो किसी प्रकार का छल-कपट नहीं करता, गुरु के प्रति जो नम्र रहता है, जिसका अंतःकरण समुद्र के गंभीर है, जो आचरण में पवित्र, शास्त्रों को जानने वाला और हर समय प्रभु को याद वाला है, वही सज्जन है

Chanakya Niti (Chapter-2) द्वितीय अध्याय का सार

इस अध्याय में सामान्य लोगों के लिए चाणक्य ने कुछ महत्वपूर्ण बातों की ओर ध्यान आकृष्ट किया है। वे कहते हैं कि इस पृथ्वी पर अन्न, जल और नीतियुक्त बातें - इन तीन को ही महत्वपूर्ण मानना चाहिए। उनके अनुसार, ये तीन चीजें ही मनुष्य के लिए रत्न के समान हैं अर्थात मनुष्य का इस संसार में इनके बिना कार्य-व्यापार करना कठिन है। धनी से धनी व्यक्ति के लिए और अत्यंत निर्धन के लिए अन्न और जल एक जैसा महत्व रखते हैं। इसके साथ नीतियुक्त मधुरवाणी इसलिए आवश्यक है कि इससे मनुष्य का कल्याण होता है। आचार्य ने आगे कहा है कि यदि व्यक्ति दरिद्र है, रोगी है, दुखी है और बंधनों तथा कष्टों में पड़ा है तो यह सब उसके अधर्म रूपी कार्यों का फल है। उनका कहना है कि इस संसार में जिन वस्तुओं को हम बहुत उपयोगी मानते हैं, उनमें से धन, मित्र, स्त्री, भूमि तथा मकान आदि मनुष्य को बार-बार मिल सकते हैं, परंतु मनुष्य जीवन ऐसा है जो बड़ी कठिनाइयों से प्राप्त होता है। इसलिए मनुष्य को चाहिए कि वह अपने जीवन को सफल बनाने का प्रयत्न करे, धर्माचरण करे, न कि हर समय संसार के भोगों में फंसा रहकर अपने जीवन को व्यर्थ गंवा दे।

प्रायः हर देश के निवासियों के लिए संगठित रहना, प्राचीनकाल से ही महत्वपूर्ण आवश्यकता रही है, इसलिए वे कहते हैं कि यदि निर्बल से निर्बल राष्ट्र संगठित रहेंगे तो अत्यंत बलवान शत्रु को भी पराजित करना उनके लिए संभव होगा। इसी संदर्भ में वे आगे कहते हैं कि जीवन में कोई समय ऐसा भी आता है, जब मनुष्य जीवन की वास्तविकता के बारे में सोचने लगता है। मनुष्य जब किसी धर्मोपदेश को सुनता है तो उसके मन में धर्माचरण की प्रवृत्ति जाग्रत होती है। जब मनुष्य किसी को अपने कंधे पर लादकर श्मशान भूमि में जाता है तो उसे ऐसा प्रतीत होता है कि यह जीवन नश्वर है और जब मनुष्य किसी रोग से पीड़ित होता है तो प्रायः हाय-हाय करता हुआ प्रभु को याद करता है। चाणक्य कहते हैं कि यदि मनुष्य सदा इसी प्रकार के विचार मन में रखे तो वह संसार के बंधनों से छूट सकता है। इसी संदर्भ में वे आगे कहते हैं कि मनुष्य जब कोई दुष्कर्म करता है तो उसके बाद वह पछताने लगता है अर्थात उसकी बुद्धि में एक परिवर्तन होता है। यदि दुष्कर्म करने से पूर्व मनुष्य की बुद्धि उस दिशा में कार्य करे तो वह संसार के बंधनों से छूट सकता है।

मोक्ष प्राप्ति में बाधक कार्यों की ओर संकेत करते हुए आचार्य का कहना है कि अभिमान मनुष्य को ले डूबता है। यदि कोई व्यक्ति यह समझता है कि उसके जैसा तपस्वी, दानी, शूरवीर और ज्ञानवान कोई दूसरा नहीं है तो यह उसका भ्रम है, क्योंकि संसार इतना विशाल है कि उसमें एक से बढ़कर एक गुणी व्यक्ति हैं। यहां एक सामान्य सी बात की ओर इशारा करते हुए आचार्य ने कहा है कि समीपता और दूरी का संबंध हृदय से है न कि स्थान से।
चाणक्य ने यहां ऐसी कूटनीतिपूर्ण बात कही है, जो किसी भी राज्य के लिए उपयुक्त हो सकती है। उनका कहना है कि जो राज्य आपको हानि पहुंचाता है, यदि आपमें शक्ति से उसका निवारण करने की योग्यता नहीं है तो उससे मित्रता गांठकर, मधुर व्यवहार का दिखावा करते हुए बुद्धिपूर्वक शक्तिहीन कर देना चाहिए।
वे आगे कहते हैं कि राजा, अग्नि, गुरु और स्त्री आदि के न तो अत्यंत निकट हैं चाहिए और न ही इनसे अत्यंत दूरी रखनी चाहिए। उदाहरण के लिए सामान्य सी बात है कि यदि व्यक्ति अग्नि के अधिक समीप जाएगा तो वह जलकर भस्म हो जाएगा। इसीलिए उन्होंने कहा है कि इन सब वस्तुओं का उपयोग मध्यम दूरी अथवा मध्यम अवस्था में करना चाहिए, क्योंकि यदि इनके सेवन में सावधानी नहीं बरती जाएगी तो नष्ट होना निश्चित है। वे कहते हैं कि जो व्यक्ति गुणी है, उसी का जीवन सफल है, जिसमें किसी प्रकार का गुण नहीं, कोई विशेष बुद्धि नहीं, उसका जीवन व्यर्थ है।

इसी संदर्भ में वे आगे कहते हैं कि मनुष्य यदि संसार को अपने वश में करना चाहता है तो उसे दूसरों की निंदा करना छोड़ देना चाहिए। समझदार व्यक्ति वही है, जो समय के अनुकूल बात करता है, अपने मान-सम्मान के अनुरूप मधुर और प्रिय वचन बोलता है और क्रोध करते समय इस बात का अनुमान कर लेता है कि वह उसकी शक्ति के अनुरूप है या नहीं। इसी के साथ ही वे कहते हैं कि संसार की प्रत्येक वस्तु को मनुष्य विभिन्न दृष्टिकोणों से देखते हैं। स्त्री का उदाहरण देते हुए वे कहते हैं कि योगी स्त्री के स्वरूप को घृणा की दृष्टि से वे एक लाश के समान देखता है। कामी व्यक्ति उसे हर प्रकार से सुंदर समझता है और कुत्ते की दृष्टि में वह एक मांस के लोथड़े अलावा कुछ नहीं है। सभी अपने भावों के अनुसार उसका दर्शन करते हैं, इसीलिए इस प्रकार की परस्पर विभिन्नता देखने में आती है। आगे चलकर चाणक्य बताते हैं कि बुद्धिमान मनुष्य को चाहिए वह अच्छे कर्म, घर के दोष, स्त्री से सहवास और अपने संबंध में सुने हुए निंदित वचनों को कभी किसी दूसरे व्यक्ति के समक्ष प्रकट न करे।

Chanakya Niti (Chapter-3) तृतीय अध्याय का सार

यह भारतीय परंपरा रही है कि किसी भी शुभ कार्य को प्रारंभ करने से पहले देवी- देवताओं अथवा प्रभु का स्मरण किया जाए ताकि वह कार्य बिना किसी व्यवधान के सरलतापूर्वक सम्पन्न हो 'चाणक्य नीति' का प्रमुख उद्देश्य यह जानना है कि कौन-सा काम उचित है और कौन-सा अनुचित आचार्य चाणक्य ने प्राचीन भारतीय नीतिशास्त्र में बताए गए नियमों के अनुसार ही इसे लिखा है। यह पूर्व अनुभवों का सार है। उनका कहना है कि लोग इसे पढ़कर अपने कर्तव्यों और अकर्तव्यों का भली प्रकार ज्ञान प्राप्त कर सकेंगे। सम-सामयिक राजनीति के ज्ञान में मनुष्य अपनी बुद्धि का पुट देकर समय के अनुसार अच्छाई और बुराई में भेद कर सकता है।

सबसे पहले आचार्य चाणक्य ने संग के महत्व पर प्रकाश डालते हुए यह बताया है कि दुष्ट लोगों के संसर्ग से बुद्धिमान मनुष्य को दुख उठाना पड़ता है चाणक्य ने मनुष्य के जीवन में धन के महत्व को बताया है। उनका कहना है कि व्यक्ति को संकट के समय के लिए धन का संचय करना चाहिए। उस धन से अपने बाल-बच्चों तथा स्त्रियों की रक्षा भी करनी चाहिए। इसके साथ उनका यह भी कहना है कि व्यक्ति को अपनी रक्षा सर्वोपरि करनी चाहिए। जिन लोगों के पास धन है, वे किसी भी आपत्ति का सामना धन के द्वारा कर सकते हैं, परंतु उन्हें यह बात भी भली प्रकार समझ लेनी चाहिए कि लक्ष्मी चंचल है। वह तभी तक टिक कर रहती है, जब तक उसका सदुपयोग किया जाता है दुरुपयोग आरंभ करते ही लक्ष्मी चलती बनती है।

चाणक्य कहते हैं कि व्यक्ति को उसी स्थान पर रहना चाहिए जहां उसका सम्मान हो, जहां पर उसके भाई-बंधु हों, आजीविका के साधन हों इसी संबंध में वह आगे कहते हैं कि जहां धनवान, वेद शास्त्रों को जानने वाले विद्वान ब्राह्मण, राजा अथवा शासन व्यवस्था, नदी और वैद्य आदि न हों, वहां भी नहीं रहना चाहिए। नौकरों की कार्यकुशलता का पता तभी चलता है, जब उन्हें कोई कार्य करने के लिए दिया जाता है। अपने संबंधियों और मित्रों की परीक्षा उस समय होती है, जब स्वयं पर कोई आपत्ति आती है। गृहस्थ का सबसे बड़ा सहारा उसकी स्त्री होती है, परंतु स्त्री की वास्तविकता भी उसी समय समझ में आती है, जब व्यक्ति पूरी तरह धनहीन हो जाता है।

मनुष्य को चाहिए कि वह अधिक लालच में न पड़े। उसे वही कार्य करना चाहिए जिसके संबंध में उसे पूरा ज्ञान हो जिस कार्य के संबंध में उसे ज्ञान न हो, उसे करने से हानि हो सकती है। जिस कार्य का अनुभव न हो, उससे संबंधित निर्णय लेना कठिन होता है। निर्णय यदि ले लिया जाए, तो संशय की स्थिति मन को डगमगाती रहती है। ऐसा निर्णय कभी भी सही नहीं होता- 'संशयात्मा विनश्यति।' मन यदि संशय में हो तो वह रास्ते से भटकाता ही नहीं, गहरे और अंधेरे गड्ढे में फेंकता है। यदि आप ऐसे व्यवसायियों का जीवन देखें, जिन्होंने अपने क्षेत्र में ऊंचाइयों को छूआ है, तो आप पाएंगे कि उन्होंने अपने काम को समझने के लिए किसी दूसरे अनुभवी व्यक्ति के नीचे काम किया है। किताबी और व्यावहारिक जानकारी में जमीन-आसमान का अंतर होता है।

विवाह के संदर्भ में, चाणक्य ने कुल के भेदभाव की बात नहीं मानी है। उनका कहना है कि नीच कुल में उत्पन्न कन्या भी यदि अच्छे गुणों से युक्त है तो उससे विवाह करने में कोई हानि नहीं जिन पर विश्वास नहीं करना चाहिए उनके बारे में आचार्य का कथन है कि सिंह और बाघ आदि तेज पंजों वाले जानवरों से दूर रहना चाहिए, ऐसी नदियों के आसपास भी नहीं रहना चाहिए, जिनके किनारे कच्चे हों और जो बरसात आदि के दिनों में लंबे-चौड़े मैदान में फैल जाती हों। इसी प्रकार लंबे सीगों वाले सांड़ आदि पशुओं से अपना बचाव रखना चाहिए। जिसके पास कोई हथियार है, उसका भी कभी विश्वास नहीं करना चाहिए।

Chanakya Niti (Chapter-4) चतुर्थ अध्याय का सार

इस अध्याय के प्रारंभ में ही स्त्रियों की ओर ध्यान दिलाया गया है। देखा जाए तो दोष तो सभी में होता है। कुछ के पास अनेक पदार्थ होते हैं, परंतु वे या तो उनका उपभोग नहीं जानते अथवा फिर उनमें उपभोग की शक्ति नहीं होती। इस अध्याय में यह भी बताया गया है कि कौन-सा परिवार सुखी रहता है। सुख उसी परिवार को प्राप्त होता है, जहां सब एक- दूसरे का सम्मान करते हैं, एक-दूसरे में श्रद्धा रखते हैं - अर्थात पुत्र को पिता और पिता को पुत्र का ध्यान रखना चाहिए।

यह संसार बड़ा विचित्र है। कुछ लोग ऐसे भी होते हैं, जो सामने तो मीठी बातें करते हैं, परंतु पीठ पीछे बुराइयां करते हैं। ऐसे लोगों से बचना चाहिए। चाणक्य तो यहां तक कहते हैं कि मन से सोची हुई बात का वाणी से भी उल्लेख नहीं करना चाहिए अर्थात अपना रहस्य अपने मित्र को भी नहीं बताना चाहिए। मूर्खता कष्टदायक होती ही है, जवानी और दूसरे के घर में आश्रित होकर रहना भी भारी दुख देने वाला होता है। उसके साथ यह भी ध्यान में रखना चाहिए कि श्रेष्ठ और उत्तम वस्तुएं तथा सज्जन लोग सब स्थानों पर प्राप्त नहीं होते।
चाणक्य ने बार-बार इस बात पर जोर दिया है कि माता-पिता को चाहिए कि वे अपनी संतान को गुणवान बनाएं, उनका ध्यान रखें और उन्हें बिगड़ने न दें। आचार्य कहते हैं कि व्यक्ति को चाहिए कि वह अपना समय सार्थक बनाए, अच्छा कार्य करे। इसके साथ उनका कहना है कि सब लोगों को अपना कार्य अर्थात कर्तव्य पूरा करना चाहिए।
कौटिल्य ने मनुष्य को बार-बार सचेत किया है कि उसे वास्तविकता समझनी चाहिए, गफलत में नहीं रहना चाहिए। उसे यह ज्ञात होना चाहिए कि वेश्या का प्रेम एक धोखा है। इसलिए उसे इस प्रकार की स्त्रियों तथा दुष्ट पुरुषों से बचना चाहिए। उसे चाहिए कि वह प्रेम और मित्रता अपने बराबर वालों से ही रखे।

Chanakya Niti (Chapter-5) पञ्चम अध्याय का सार

आचार्य ने विशेष रूप से मनुष्य के आचार अर्थात चरित्र के संबंध में कुछ बातें कही हैं। उन्होंने माना है कि अच्छे-से-अच्छे कुल में कहीं-न-कहीं किसी प्रकार का दोष मिल ही जाता है और संसार में ऐसा कौन-सा पुरुष हैं, जो कभी रोगों का शिकार न हुआ हो। सभी में कोई-न-कोई व्यसन भी होता है। इस संसार में लगातार किसको सुख प्राप्त होता है अर्थात कोई सदा सुखी नहीं रह सकता, कभी-न-कभी वह कष्टों में पड़ता ही है। सुख-दुख का संबंध दिन-रात की तरह है।
महान व्यक्तियों को और धर्मात्माओं को अनेक कष्ट उठाने पड़ते हैं। ऐसा संसार का नियम है। चाणक्य का मानना है कि मनुष्य के आचार-व्यवहार से, बोलचाल से, दूसरों के प्रति मान-सम्मान प्रकट करने से उसके कुल की विशिष्टता का ज्ञान होता है। आचार्य का मानना है कि पुत्री का विवाह अच्छे आचरणशील परिवार में करना चाहिए और पुत्रों को ऐसी प्रेरणा देनी चाहिए कि वे उच्च शिक्षा प्राप्त करें। शिक्षा ही जीने की कला सिखाती है। शत्रु को व्यसनों में फंसाने की बात करते हुए आचार्य संकेत करते हैं कि शत्रु का नाश बौद्धिक चातुर्य के साथ किया जाना चाहिए। इसलिए सावधान रहें और लाभ उठाएं। चाणक्य ने शिक्षा और बुद्धिमत्ता पर सब कार्यों की अपेक्षा अधिक जोर दिया है। वे कहते हैं। कि मूर्ख भी सज्जन और बुद्धिमान की तरह दो पैर वाला होता है परंतु वह चार पैर वाले पशु से भी निकृष्ट और गया-गुजरा माना जाता है, क्योंकि उसके कार्य सदैव कष्ट पहुंचाने वाले होते हैं। चाणक्य कहते हैं कि यदि कोई व्यक्ति अच्छे कुल में उत्पन्न हुआ है तथा रूप और यौवन आदि से भी युक्त है, परंतु उसने विद्या ग्रहण नहीं की तो यह सब उसी प्रकार निरर्थक है जिस प्रकार बिना सुगंध के सुंदर फूल उनका मानना है कि किसी का सम्मान उसके गुणों के कारण होता है, न कि रूप और यौवन के कारण। आचरण से संबंधित एक और महत्वपूर्ण बात चाणक्य ने यह कही है कि यदि किसी एक व्यक्ति के बलिदान से पूरे कुल का कल्याण हो तो उसका बलिदान कर देना चाहिए, परंतु उन्होंने मनुष्य को सर्वोपरि माना है। और वे कहते हैं कि यदि व्यक्ति अपने कल्याण के लिए चाहे तो प्रत्येक वस्तु का बलिदान कर सकता है।
उनका मानना है कि व्यक्ति को अपनी निर्धनता दूर करने के लिए उद्यम और पापों से बचने के लिए प्रभु का स्मरण करते रहना चाहिए। उन्होंने बार-बार मनुष्य को सचेत किया है कि वह किस प्रकार कष्टों से बच सकता है। उनका कहना है कि व्यक्ति को सदैव सतर्क रहना चाहिए। आचरण में आचार्य किसी भी तरह की अति के पक्ष में नहीं हैं।

आचार्य के अनुसार मधुर भाषण करने वाला व्यक्ति समूचे संसार को अपना बना सकता है। अनेक कुपुत्र होने के बजाय एक सुपुत्र होना कहीं अच्छा है। चाणक्य ने बाल मनोविज्ञान पर भी प्रकाश डाला है। उनका कहना है कि पांच वर्ष तक की आयु के बच्चे से लाड़-दुलार करना चाहिए। इसके बाद की आयु में अनुशासित करने के लिए डांट-फटकार, ताड़ना करने की आवश्यकता हो, तो वह भी करनी चाहिए, परंतु जब बच्चा सोलह वर्ष की आयु तक पहुंच जाता है तब उसे मित्र के समान समझकर व्यवहार करना चाहिए। श्लोक में 'पुत्र' शब्द का प्रयोग संतान के अर्थ में किया गया है। बेटियों के संदर्भ में भी यही नियम लागू होता है।
आचार्य ने बार-बार मनुष्यों को यह बताने-समझाने का प्रयत्न किया है कि यह मानव शरीर अत्यंत मूल्यवान है। व्यक्ति को अपना दायित्व निभाने के लिए यथाशक्ति धर्माचरण करते रहना चाहिए। चाणक्य इस अध्याय के अंत में समूचे समाज को मूर्खों से बचने का परामर्श देते हैं। अपने अन्न तथा अन्य उत्पाद को ठीक ढंग से संभालकर रखना चाहिए और आपस में प्रेमपूर्वक रहना चाहिए। झगड़े-फसाद में अपना जीवन नष्ट नहीं करना चाहिए। ऐसा करके हम स्वयं को दुख के गर्त में डालते हैं।

Chanakya Niti (Chapter-6) षष्ठ अध्याय का सार

चाणक्य का कहना है कि जीव जब गर्भ में होता है, तभी उसकी आयु कर्म, धन, विद्या और मृत्यु आदि बातें निश्चित हो जाती हैं अर्थात मनुष्य जन्म के साथ ही निश्चित कर्म है। के बन्धनों में बंध जाता है। इस संसार में आने के बाद सज्जनों के संसर्ग के फलस्वरूप व्यक्ति सांसारिक बंधनों से मुक्त होता है। अच्छे लोगों का साथ हर तरह से मनुष्य की रक्षा के लिए ही होता है। आचार्य के अनुसार, मनुष्य जब तक जीवित है, तब तक उसे पुण्य कार्य करने चाहिए, क्योंकि इसी से उसका कल्याण होता है और जब मनुष्य देह त्याग देता है तो वह कुछ भी नहीं कर सकता।
विद्या को चाणक्य ने कामधेनु के समान बताया है। जिस तरह कामधेनु से सभी इच्छाएं पूरी हो जाती हैं, उसी प्रकार विद्या से मनुष्य अपनी सभी मनोकामनाओं को पूर्ण कर सकता है। विद्या को बुद्धिमानों ने गुप्त धन भी कहा है। चाणक्य कहते हैं कि अनेक मूर्ख पुत्रों की अपेक्षा एक गुणी पुत्र अधिक हितकर होता है। उनका कहना है कि मूर्ख पुत्र यदि दीर्घ आयु वाला होता है तो वह आयुभर कष्ट देता रहता है, इससे तो अच्छा है कि वह जन्म के समय ही मर जाए, क्योंकि ऐसे पुत्र की मृत्यु से दुख थोड़ी देर के लिए होगा।
उनका कहना है कि इस संसार में दुखी लोगों को अच्छे पुत्र, पतिव्रता स्त्री और सज्जनों से ही शांति प्राप्त होती है। सांसारिक नियमों के अनुसार चाणक्य बताते हैं कि राजा एक ही बात को बार-बार नहीं कहते, पण्डित लोग भी (मंत्रों को) बातें बार-बार नहीं दोहरातेऔर कन्या का भी एक ही बार दान किया जाता है। इसलिए इन कर्मों को करते हुए सावधानी बरतनी चाहिए।व्यक्ति को तपस्या अकेले करनी चाहिए। विद्यार्थी मिलकर पढ़ें तो उन्हें लाभ होता है। इसी प्रकार संगीत, खेती आदि में भी सहायकों की आवश्यकता होती है। युद्ध के लिए तो जितने अधिक सहायक हों उतने ही अच्छे रहते हैं।

चाणक्य कहते हैं कि उसी पत्नी का भरण-पोषण करना चाहिए जो पतिपरायणा हो। मनुष्य के घर में कोई संतान नहीं, वह घर सूना होता है। जिसके कोई रिश्तेदार और जिस बन्धु बान्धव नहीं, उसके लिए यह संसार ही सूना है। दरिद्र अथवा निर्धन के लिए तो सब कुछ सूना है। विद्या की प्राप्ति के लिए अभ्यास करना पड़ता है, बिना अभ्यास के विद्या के समान होती है। जिस प्रकार अपच के समय ग्रहण किया हुआ भोजन विषतुल्य होता है। और निर्धन व्यक्ति के लिए सज्जनों की सभा में बैठना मुश्किल होता है, उसी प्रकार बूढ़े व्यक्ति के लिए स्त्री संसर्ग विष के समान होता है।
धर्म उसे कहते हैं, जिसमें दया आदि गुण हों। गुरु उसे कहते हैं जो विद्वान हो । पत्नी वह होती है, जो मधुरभाषिणी हो, बन्धु-बान्धव वह होते हैं, जो प्रेम करें, परंतु यदि इनमें यह अर्थात धर्म दया से हीन हो, गुरु मूर्ख हो, पत्नी क्रोधी स्वभाव की हो और रिश्तेदार बंधु-बांधव प्रेमरहित हों, तो उन्हें त्याग देना चाहिए। अधिक यात्राएं करने से मनुष्य जल्दी बूढ़ा होता है। स्त्रियों की कामतृष्टि न हो तो वे जल्दी बूढ़ी हो जाती हैं और कपड़े यदि अधिक देर तक धूप में पड़े रहें तो जल्दी फट जाते हैं।
चाणक्य बताते हैं कि मनुष्य को अपनी उन्नति के लिए चिंतन करते रहना चाहिए कि समय किस प्रकार का चल रहा है? मित्र कौन हैं और कितने हैं? कितनी शक्ति है? बारबार किया गया ऐसा चिंतन मनुष्य को उन्नति के मार्ग पर ले जाता है। इस अध्याय के अंत में आचार्य चाणक्य कहते हैं कि ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य आदि का देवता अग्नि अर्थात अग्निहोत्र है। ऋषि-मुनियों का देवता उनके हृदय में रहता है, अल्पबुद्धि लोग मूर्ति को अपना देवता मानते हैं और जो सारे संसार के प्राणियों को एक जैसा मानते हैं उनका देवता सर्वव्यापक और सर्वरूप ईश्वर है।

Chanakya Niti (Chapter-7) सप्तम अध्याय का सार

गुरु की महिमा का वर्णन सर्वत्र किया गया है, परंतु चाणक्य ने यह भी स्पष्ट किया है कि सामान्य जीवन में कौन किसका गुरु होता है। उनका कहना है कि स्त्रियों का गुरु उसका पति होता है, गृहस्थ का गुरु अतिथि होता है। ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य का गुरु अग्नि अर्थात अग्निहोत्र है और चारों वर्णों का गुरु ब्राह्मण होता है।
जिस प्रकार सोने को कसौटी पर घिसकर, आग में तपाकर उसकी शुद्धता की परख होती है, उसी प्रकार मनुष्य अपने अच्छे कर्मों और गुणों से पहचाना जाता है और प्रतिकूल परिस्थितियों में ये निखरते हैं। चाणक्य कहते हैं कि मनुष्य को जीवन में भयभीत होने की आवश्यकता नहीं। उसे निडर होकर कार्य करने चाहिए यदि किसी भय की आशंका हो तो भी घबराना नहीं चाहिए बल्कि संकट आने पर उसका डटकर मुकाबला करना चाहिए।
चाणक्य कहते हैं कि यह आवश्यक नहीं है कि एक ही माता से उत्पन्न होने वाली संतान एक ही प्रकार के स्वभाव वाली हो, सबमें अलग-अलग गुण होते हैं। यह वैयक्तिक भिन्नता तो प्रकृति का विशेष गुण है।

चाणक्य का मानना है कि कोई भी व्यक्ति वह वस्तु प्राप्त नहीं कर सकता, जिसे प्राप्त करने की उसमें इच्छा न हो। जिसे विषय-वासनाओं से प्रेम नहीं, वह शृंगार अथवा सुंदरता बढ़ाने वाली वस्तुओं की मांग नहीं करता जो व्यक्ति बिना किसी लाग-लपेट के स्पष्ट बात कहता है, वह कपटी नहीं होता। विद्या अभ्यास से प्राप्त होती है और आलस्य से नष्ट हो जाती है। दूसरे के हाथ में दिया हुआ धन वापस मिलना कठिन होता है और जिस खेत में बीज कम डाला जाता है, वह फसल नष्ट हो जाती है। चाणक्य कहते हैं कि दान देने से धन घटता नहीं वरन् दानदाता की दरिद्रता समाप्त होती है। सद्बुद्धि द्वारा मूर्खता नष्ट होती है। और मन में सकारात्मक विचारों से भय समाप्त हो जाते हैं।
मनुष्य में अनेक ऐसे दोष होते हैं, जिनसे उसे अनेक कष्ट उठाने पड़ते हैं चाणक्य कहते हैं कि कामवासना से बढ़कर कोई दूसरा रोग नहीं, मोह और क्रोध के समान स्वयं को नष्ट करने वाला कोई शत्रु नहीं । चाणक्य का कहना है कि क्रोध व्यक्ति को हर समय जलाता रहता है। मनुष्य जो कर्म करता है, अच्छा या बुरा, उसका फल उसे अकेले ही भोगना पड़ता है, वह अकेला ही इस संसार में जन्म लेता है और अकेला ही मरता भी है। स्वर्ग अथवा नरक में भी वह अकेला ही जाता है, केवल कर्म ही उसके साथ जाते हैं।

मनुष्य जब विदेश में जाता है तो उसका ज्ञान और बुद्धि ही साथ देती है। घर में पत्नी ही सच्ची मित्र होती है। औषधि रोगी के लिए हितकर होने के कारण उसकी मित्र है। मृत्यु के, बाद जब संसार की कोई वस्तु या व्यक्ति मनुष्य का साथ नहीं देता उस समय धर्म ही व्यक्ति का मित्र होता है। चाणक्य का कहना है कि वर्षा के जल से श्रेष्ठ दूसरा जल नहीं और व्यक्ति का आत्मबल ही उसका सबसे बड़ा बल है। मनुष्य का तेज उसकी आंखें हैं और उसकी सबसे प्रिय वस्तु है अन्न संसार में कोई भी अपनी स्थिति से संतुष्ट नहीं है जो पास में नहीं है, उसी की चाह प्रत्येक व्यक्ति करता है। निर्धन धन चाहता है। पशु वाणी चाहते हैं। मनुष्य स्वर्ग की और देवत्व को प्राप्त जीव मोक्ष की कामना करते हैं। आचार्य यहां संकेत दे रहे हैं कि देवता भी असुरक्षित हैं। उन्हें भी पुण्य समाप्ति के बाद मृत्युलोक में आना पड़ता है इसीलिए वे देवयोनि से भी मुक्त होना चाहते हैं।
सत्य की महत्ता बताते हुए चाणक्य कहते हैं कि सत्य के कारण ही दुनिया के समस्त कार्य-व्यापार चल रहे हैं। लक्ष्मी, मनुष्य के प्राण और यह संसार सभी नश्वर हैं, केवल धर्म ही शाश्वत है अर्थात मनुष्य को अपनी रुचि धर्म में रखनी चाहिए।

Chanakya Niti (Chapter-8) अष्टम अध्याय का सार

श्रवण का जीवन में अत्यंत महत्व है लेकिन उसकी भी एक सुनिश्चित विधि है । गुरुमुख से ही शास्त्र का श्रवण करना चाहिए। गुरु विद्वान और अनुभवी होता है, इसलिए उसके सुने वचनों को जीवन में धारण करने से भटकाव समाप्त होता है, निश्चित दिशा मिलती है। चाणक्य का कहना है कि मनुष्य जीवन बड़े सौभाग्य से प्राप्त होता है। इसलिए मनुष्य को चाहिए कि वह अपने जीवन को शुभ कार्यों की ओर लगाए, दूसरों की निंदा आदि करना छोड़ दे। वेद आदि शास्त्रों के पढ़ने और शुभ कार्य करने से मनुष्य इस संसार में यश को प्राप्त होता है। चाणक्य कहते हैं, जिस मनुष्य के पास धन है, सभी उसके भाई-बंधु, मित्र बनने को तैयार हो जाते हैं और उसे ही श्रेष्ठ पुरुष मान लिया जाता है। वे यह भी कहते हैं कि जैसी होनी होती है, मनुष्य की बुद्धि और उसके कर्म भी उसी प्रकार के हो जाते हैं। इस संसार में समय ही ऐसी वस्तु है जिसे टाला नहीं जा सकता। चाणक्य के अनुसार जब मनुष्य अपने स्वार्थ में अंधा हो जाता है तो उसे अच्छे-बुरे में अंतर दिखाई नहीं देता। मनुष्य का बंधन और मुक्ति उसके द्वारा किए जाने वाले कर्मों पर ही आश्रित होते हैं, क्योंकि वह जैसा कर्म करता है, उसे वैसा ही फल भोगना पड़ता है।


आचार्य के अनुसार प्रजा के कार्यों का फल राजा को, पत्नी के कार्यों का फल पति को तथा पिता द्वारा छोड़ा गया ऋण पुत्रों को चुकाना पड़ता है। व्यभिचारिणी माता और मूर्ख पुत्र मनुष्य के लिए शत्रु के समान होते हैं। चाणक्य सामान्य जीवन में आने वाली समस्याओं पर प्रकाश डालते हुए कहते हैं कि किसी का लोभी व्यक्ति से पाला पड़ जाए तो उसे धन देकर, विद्वान को अपने मधुर व्यवहार से और मूर्ख तथा दुष्ट को उसके अनुकूल व्यवहार से वश में किया जा सकता है। ऐसे राज्य में रहना उचित नहीं, जहां सुव्यवस्था न हो। इसी प्रकार दुष्ट से मित्रता करने के बजाय मित्ररहित रहकर जीवन गुजार देना ज्यादा हितकर है।
चाणक्य का कहना है कि सिंह से एक गुण सीखना चाहिए- किसी भी कार्य को करते समय उसमें अपनी पूरी शक्ति लगाना। बगुला मछली पकड़ने के लिए आंखें बंद करके एक टांग पर खड़ा होता है, यह इंद्रियों को वश में करने का उदाहरण है। यह बगुले से सीखने योग्य गुण है। प्रयास करना महत्वपूर्ण है, इसलिए उसे करने से पहले अपनी क्षमता को परख लें। बगुला यह निश्चित हो जाने के बाद ही कि अब शिकार बच नहीं सकता, अपना प्रयास करता है। 

इसी प्रकार मुर्गे से चार बातें सीखनी चाहिए। मनुष्य को ब्रह्ममुहूर्त में उठना, झगड़े का संकट उत्पन्न होने पर पीछे न हटना और जो कुछ भी प्राप्त हो उसे अपने भाई-बन्धुओं में बांटकर ही उपयोग में लाना। इसी प्रकार कौए में भी पांच गुण होते हैं, छिपकर मैथुन करना, हठी होना, समय-समय पर वस्तुओं को इकट्ठा करना, हमेशा चौकन्ना रहना तथा किसी पर विश्वास न करना । कुत्ते में बहुत अधिक खाने की शक्ति होती है, परंतु जब उसे बहुत कम भोजन मिलता है तब भी वह उसी में संतोष कर लेता है। वह एकदम गहरी नींद में सो जाता है, परंतु अत्यंत सतर्क रहता है और जरा-सी आहट होने पर ही जाग उठता है। उसे अपने मालिक से प्रेम होता है और समय पड़ने पर वह वीरतापूर्वक शत्रु से लड़ता भी है। इसी प्रकार गधा अत्यंत थका होने पर भी अपने काम में लगा रहता है, उसे सर्दी-गर्मी आदि किसी बात का कष्ट नहीं होता और अपने जीवन से पूर्णरूप से संतुष्ट रहता है।
चाणक्य के अनुसार जो व्यक्ति इन गुणों को धारण कर लेता है, उसे जीवन में सफलता प्राप्त होती ही है। सफलता की कामना करने वाले को चाहिए कि वह इन गुणों को अपने जीवन में विशेष स्थान दे। इनके आधार पर हम अपनी संभावनाओं को भी आंक सकते हैं। देखिए, कसौटी पर घिसकर अपने खरेपन को ।

Chanakya Niti (Chapter-9) नवम अध्याय का सार

मनुष्य को कई कारणों से धन की हानि होती है। कई कारणों से वह दुखी रहता है। परिवार में कभी कुछ दोष भी आ जाते हैं तथा कई बार उसे धूर्त लोगों के हाथों से धोखा भी उठाना पड़ता है। चाणक्य का कहना है कि मनुष्य को ऐसी बातों को किसी दूसरे पर प्रकट करने की आवश्यकता नहीं, क्योंकि ऐसा करने से जगहंसाई के अतिरिक्त कुछ हाथ नहीं आता। इससे सामाजिक प्रतिष्ठा पर भी आंच आती है। जो मनुष्य लेन-देन के संबंध में संकोच करता है, उसे हानि उठानी पड़ती है। किसी विद्या की प्राप्ति अथवा कोई गुण सीखते समय भी मनुष्य को संकोच नहीं करना चाहिए। यहां संकोच न करने का अर्थ यह नहीं है कि मनुष्य अत्यंत लोभी हो जाए। मनुष्य को संतोषी होना चाहिए, परंतु कुछ बातें ऐसी भी हैं जिनके संबंध में संतोष करने से हानि होती है, जैसे - विद्या, प्रभु स्मरण और दान आदि ।

यहां आचार्य ने सामान्य आचरण की बातों का भी उल्लेख किया है क्योंकि इनसे व्यक्तिगत रूप से लाभ होता है और सामाजिक प्रतिष्ठा भी प्राप्त होती है। जहां दो मनुष्य बात कर रहे हों, उनके बीच में नहीं पड़ना चाहिए। इसी प्रकार जब कोई ब्राह्मण हवन आदि कर रहा हो तो उसके बीच से गुजरना ठीक नहीं। हल और बैल के बीच में जो अंतर होता है, उसे बनाए रखना चाहिए। यदि उस बीच में आने का कोई प्रयत्न करेगा तो हल के ( फाल) अगले तीखे भाग से घायल हो जाएगा। अग्नि, गुरु, ब्राह्मण, गौ, कन्या, वृक्ष और बालक को पैर नहीं लगाना चाहिए। इन्हें पैर लगाने का अर्थ है उनका अपमान करना। उन्होंने यहां पर यह भी बताया है कि ब्राह्मण को यदि सम्मानपूर्वक भोजन आदि करवा दिया जाए तो वह संतुष्ट हो जाता है। आकाश में उमड़ते बादलों को देखकर मोर प्रसन्न होता है। साधु अथवा सज्जन लोग दूसरों का कल्याण होने से प्रसन्न होते हैं, परंतु दुष्ट आदमी दूसरे की भलाई नहीं देख सकता। उसे इससे कष्ट होता है।
चाणक्य ने जहां समय के अनुकूल आचरण करने की बात कही है, वहीं वे यह भी कहते हैं कि अपने से बलवान शत्रु को चतुरतापूर्वक अनुकूल व्यवहार करके प्रसन्न करना चाहिए और अपने से कमजोर दिखाई देने वाले शत्रु को भय दिखाकर वश में कर लेना चाहिए। इस प्रकार राजा में चतुरता, विनम्रता और बल का सम्मिश्रण होना चाहिए। ब्राह्मण को अपनी शक्ति वेद आदि शास्त्रों के ज्ञान से बढ़ानी चाहिए जबकि स्त्रियों की शक्ति उनकी मधुर वाणी है।
चाणक्य कहते हैं कि व्यक्ति को अत्यन्त सरल और सीधे स्वभाव का भी नहीं होना चाहिए। सीधे व्यक्ति को सब अपने उपयोग में लाना चाहते हैं, जिससे उसे अकसर हानि ही होती है, क्योंकि उसके हित की चिंता किसी को नहीं होती।
आचार्य के अनुसार व्यक्ति को सदैव अपना रूप नहीं बदलते रहना चाहिए और न ही अपना स्थान। वे कहते हैं कि केवल उसी धनी व्यक्ति का सम्मान समाज में होता है, जो उस धन का सदुपयोग करता है अर्थात अच्छे धन को कामों में लगाता है, क्योंकि जो अच्छे लोग इस संसार में आते हैं, उनमें दान देने की प्रवृत्ति होती है। जो कटु-भाषण नहीं करते, देवी- देवता तथा ईश्वर की पूजा करते हैं और ब्राह्मणों को भोजन आदि से संतुष्ट रखते हैं - वस्तुतः वे ही श्रेष्ठ पुरुष कहलाते हैं। इसके विपरीत आचरण करने वाले दुष्टों की श्रेणी में आते हैं।

Chanakya Niti (Chapter-10) दशम अध्याय का सार

चाणक्य ने इस अध्याय में शरीर की दृष्टि से एक समान दिखने वाले मनुष्यों का गुणों और प्रवृत्ति के अनुसार विभाजन किया है। स्वभाव और प्रवृत्ति ही व्यक्ति को उत्तम, मध्यम और निम्न बनाती है। निम्न श्रेणी के लोग जैसे-तैसे धन इकट्ठा करना चाहते हैं। वे ऐसे उपायों से भी धन प्राप्त करना चाहते हैं जिनसे उनका अपमान होता है। उन्हें मान-अपमान की कोई चिंता नहीं होती। मध्यम श्रेणी के लोग मान-सम्मान के साथ-साथ धन इकट्ठा करना चाहते हैं, परंतु उत्तम श्रेणी के लोग केवल मान-सम्मान को ही महत्व देते हैं, धन उनके लिए गौण होता है, मुख्य नहीं।

चाणक्य कहते हैं कि व्यक्ति जिस प्रकार का भोजन करता है, जैसा अन्न खाता है। उसकी संतान भी वैसी ही होती है। यह संकेत है कि भोजन केवल स्वाद या पेट भरने की दृष्टि से ही महत्वपूर्ण नहीं है, यह मानव-जाति के भविष्य को भी निर्धारित करता है।
चाणक्य ने तीन बातें मृत्यु के समान कष्ट देने वाली बताई हैं- वृद्धावस्था में मनुष्य की पत्नी की मृत्यु होना, धन-संपत्ति का दूसरों के हाथों में जाना और खान-पान के लिए दूसरों पर आश्रित रहना। इनमें से दो का अनुभव तो किसी भी अवस्था के व्यक्ति को हो सकता है लेकिन एक का संबंध विशेष अवस्था से है। इस ओर संकेत करके आचार्य ने जीवन के कटु सत्य को उजागर किया है। इससे उस अवस्था में पुरुष की निरीहता भी प्रकट होती है।
चाणक्य ने व्यक्ति के विचारों और उसकी भावना को अधिक महत्वपूर्ण बताया है। उन्होंने कहा है कि लकड़ी, पत्थर और धातु की मूर्तियों की यदि शुद्ध भावना और श्रद्धा से पूजा की जाए तो सब कार्य पूर्ण हो जाते हैं। इन मूर्तियों में भगवान का वास उस रूप में नहीं होता जैसा कि लोग मानते हैं। मनुष्य की उच्च भावनाएं अथवा विचार ही मूर्ति को माध्यम बनाकर पूजक का कल्याण करते हैं।

Chanakya Niti (Chapter-11) एकादश अध्याय का सार

चाणक्य ने मनुष्य को जीवन का लक्ष्य बताते हुए कहा है कि जो व्यक्ति संसार से मुक्त होना चाहते हैं, उन्हें विषय-वासनाओं का त्याग विष के समान कर देना चाहिए अर्थात् बेहिचक जो नीच मनुष्य दूसरों के प्रति घृणा के कारण कठोर बात बोलते हैं, वे नष्ट हो जाते हैं। कोई भी उनका सम्मान नहीं करता।
चाणक्य संसार की विचित्र धारणा को व्यक्त करते हुए बताते हैं कि सोने में सुगंध नहीं होती, ईख पर फल नहीं लगता, चंदन के वृक्ष पर फूल नहीं लगते, विद्वान व्यक्ति के पास धन नहीं होता और राजा को प्रायः अधिक आयु नहीं मिलती- ये बातें देखकर ऐसा लगता है कि परमेश्वर ने यह काम करते हुए बुद्धि का सहारा नहीं लिया। अर्थात् भूल तो किसी से भी हो सकती है। काश! परमात्मा ने ऐसा किया होता। चाणक्य कहते हैं कि अमृत सबसे उत्तम औषधि होती है क्योंकि इससे मृत्यु, रोग से मुक्ति मिल जाती है। सबसे बड़ा सुख भोजन की प्राप्ति है, ज्ञानेंद्रियों में सबसे उत्तम आंख है और शरीर के अंगों में सबसे श्रेष्ठ मनुष्य का सिर है।


ब्राह्मण की विद्वत्ता बताते हुए चाणक्य का कथन है कि आकाश में कोई गया नहीं, सूर्य, चंद्रमा तक कोई पहुंचा नहीं, परंतु जिस विद्वान ब्राह्मण ने उनकी गति, उनके ग्रहण से संबंधित ज्ञान दिया है और भविष्यवाणी की है, उसे विद्वान मानने में संकोच नहीं करना चाहिए अर्थात् पृथ्वी पर बैठे-बैठे जिसने इन आकाशीय घटनाओं का पूरी तरह से सही आकलन कर लिया, वह अवश्य सराहना के योग्य है।
चाणक्य ने अनेक स्थानों पर कहा है कि व्यक्ति को संसार में सतर्क होकर जीवन बिताना चाहिए। विद्यार्थी, नौकर, यात्री और भूख से दुखी, डरा हुआ व्यक्ति और द्वाररक्षक - इन्हें सदा जागते रहना चाहिए, यदि इन्हें सोता देखें तो इन्हें जगा दें लेकिन राजा, सांप, बाघ, जंगली सूअर और दूसरे का कुत्ता तथा मूर्ख व्यक्ति यदि सोए पड़े हों तो इन्हें जगाना नहीं चाहिए ये सोए ही हितकारी हैं।
इस अध्याय में आचार्य चाणक्य ने ब्राह्मणों के संबंध में कहा है कि उन्हें पतित लोगों से किसी प्रकार की सहायता नहीं लेनी चाहिए क्योंकि ऐसे लोगों के स्वार्थ भी तुच्छ ही होते हैं। समय आने पर उनकी पूर्ति में सहयोग करना और न करना दोनों ही स्थितियां दुविधावाली हैं। सहयोग करने पर नैतिकता की हानि होती है तथा न करने पर कृतघ्न होने का आभास होता है। आचार्य का कहना है कि मनुष्य को अपना वास्तविक स्वभाव नहीं छोड़ना चाहिए अर्थात यदि सांप विषरहित है तो भी उसे अपने पर आक्रमण करने वाले को डराने के लिए फन फैलाते रहना चाहिए। इसका अर्थ यह है कि आडम्बर से भी दूसरे व्यक्तियों को प्रभावित किया जा सकता है। किसी संत द्वारा सर्प को दिया गया यह उपदेश सभी ने पढ़ा-सुना होगा कि फुफकारना जरूर चाहिए, भले ही डंसने का मन न हो ।

मूर्खों को इस बात का ज्ञान नहीं होता कि किस समय कौन-सा कार्य किया जाए, वह प्रातःकाल ही जुआ आदि खेलने लगते हैं, दोपहर का समय भोग-विलास और रात्रि का समय चोरी आदि बुरे कामों में बिताते हैं। ये तीनों कार्य धर्म और कानून दोनों दृष्टि से निषिद्ध हैं। इनसे धन और सम्मान की हानि होती है। सबसे बढ़कर इनसे आत्मा का पतन होता है। चाणक्य का कहना है कि प्रभु की उपासना व्यक्ति को स्वयं करनी चाहिए। जिस प्रकार भूख- प्यास तभी शांत होती है, जब आप स्वयं भोजन खाते और पानी पीते हैं, उसी प्रकार आपके द्वारा किए गए शुभ कर्म - ईश्वर उपासना आदि तभी पूरी तरह से फल देता है, जब आप उसे स्वयं करें। व्यक्ति को कष्टों में धैर्य रखना चाहिए। धैर्य से कष्ट उतने दुखदायी प्रतीत नहीं होते जितने धैर्य न होने पर। अनुभव में तो यह भी आया है कि धैर्य दुख को कम ही नहीं करता बल्कि सुख को भी साथ के साथ उजागर कर देता है। ऐसे में दुख दुख रहता ही नहीं है। श्रीकृष्ण ने गीता में धैर्यशील को अमृतत्व का अधिकारी माना है-यो धीरः सः अमृतत्वाय कल्पते। इस प्रकार मनुष्य का सबसे सर्वाधिक महत्वपूर्ण गुण है धैर्य ।

Chanakya Niti (Chapter-12) द्वादश अध्याय का सार

चाणक्य ने विद्या रूपी धन को सब धनों में श्रेष्ठ माना है। उनका कहना है कि जिस मनुष्य के पास विद्या रूपी धन नहीं, वह सब कुछ होते हुए भी 'हीन' है। 'पहले सोचें, फिर करें', चाणक्य ऐसा करने की सलाह देते हैं। करने के बाद सोचने का तो कोई अर्थ ही नहीं है। विद्यार्थी के कर्तव्य की ओर ध्यान दिलाते हुए आचार्य फिर कहते हैं कि जो विद्यार्थी विद्या प्राप्त करना चाहता है, उसे सुख की अभिलाषा छोड़ देनी चाहिए।
चाणक्य का मानना है कि व्यक्ति पुरुषार्थ के बावजूद भाग्य से ही निर्धन से धनी होता है। इस प्रकार जीवन में भाग्य की महत्वपूर्ण भूमिका है। नियति की गति को समझना ही बुद्धिमत्ता है।


चाणक्य यहां फिर कहते हैं कि मनुष्य को विद्या रूपी धन प्राप्त करना चाहिए, दानशील होना चाहिए, धर्म से युक्त होना चाहिए परंतु जिस मनुष्य में ऐसी कोई भी बात नहीं, वह पृथ्वी पर पशु के समान है और भाररूप है। व्यक्ति को अपनी भीतरी योग्यता का ज्ञान होना चाहिए। जिसमें भीतरी योग्यता नहीं और जो बुद्धिहीन है, वेद आदि शास्त्रों से भी उसका कल्याण नहीं हो सकता। चाणक्य कहते हैं कि दुष्ट व्यक्ति सदा दुष्ट ही रहता है, वह अपना स्वभाव कभी नहीं छोड़ता ।
अपने बन्धु बान्धवों, रिश्तेदारों में मनुष्य को निर्धन होकर अपना जीवन नहीं बिताना चाहिए। उसे चाहिए कि वह अपनी निर्धनता दूर करने का प्रयत्न करे। चाणक्य ने इस संसार के रंग-ढंग का वर्णन करते हुए कहा है कि जिस प्रकार सायंकाल के समय अनेक पक्षी एक वृक्ष पर आकर बसेरा लेते हैं और प्रातःकाल अपनी दिशाओं में उड़ जाते हैं, उसी प्रकार बन्धु बान्धव भी मनुष्य को संयोग से ही मिलते हैं, इसलिए उनके बिछुड़ने का मनुष्य को शोक नहीं करना चाहिए। यह तो प्रकृति का नियम है। चाणक्य मनुष्य की बुद्धि को ही उसका सबसे बड़ा सहायक मानते हैं। उनका मानना है कि जब परमेश्वर ही संसार का पालन करने वाला है तो जीविका की चिंता क्यों?

Chanakya Niti (Chapter-13) त्रयोदश अध्याय का सार

चाणक्य कहते हैं कि कुछ बातें मनुष्य में स्वाभाविक रूप से होती हैं, उन्हें केवल अभ्यास से प्राप्त नहीं किया जा सकता। दान में रुचि, मधुर भाषण की इच्छा, मधुरता, वीरता ये गुण मनुष्य को स्वभाव से ही प्राप्त होते हैं, अभ्यास से केवल इनमें वृद्धि की सकती है, तराशा जा सकता है बस। चाणक्य कहते हैं कि मनुष्य को अपना स्वभाव नहीं छोड़ना चाहिए क्योंकि जो अपने स्वभाव और कर्म को छोड़कर दूसरे के आश्रय में जाता है, वह नष्ट हो जाता है।

चाणक्य कहते हैं कि मोटे शरीर को देखकर ऐसा नहीं मानना चाहिए कि वह बहुत बलवान हो सकता है। लंबे-चौड़े शरीर वाला हाथी छोटे से अंकुश से वश में कर लिया जाता है। इसी प्रकार दीपक की छोटी-सी ली वर्षों के अंधकार को पलभर में नष्ट कर देती है। इतना ही नहीं अपने से कई गुना लंबाई-चौड़ाई में वह प्रकाश फैलाती है। बड़े- बड़े पहाड़ों और शिलाओं को हथौड़े की चोट से तोड़ा जा सकता है जबकि हथौड़े का आकार भार पहाड़ों और शिलाओं से बहुत कम होता है। इसलिए लंबे-चौड़े शरीर को देखकर यह नहीं मान लेना चाहिए कि वह बलवान है।

चाणक्य के अनुसार विद्यार्थी को विद्या की प्राप्ति के समय घर से मोह नहीं रखना चाहिए। यदि वह घर के मोह में फंसा रहेगा तो उसे विद्या प्राप्त नहीं होगी। उनका कहना है कि दुष्ट व्यक्ति को जितना भी समझाया जाए, वह दुष्ट ही रहता है, उसका सज्जन बनना उसी प्रकार असंभव है, जैसे नीम के पेड़ को दूध, घी, चीनी आदि से सींचने पर भी उसमें मिठास पैदा नहीं की जा सकती। इसी संबंध में वे आगे कहते हैं कि जिस मनुष्य का अंतःकरण शुद्ध नहीं, यदि वह अनेक बार तीर्थयात्रा भी करता है तो भी वह पवित्र नहीं हो सकता।

आचार्य का मानना है कि गुणों की श्रेष्ठता को समझना प्रत्येक व्यक्ति के बस की बात नहीं है। जो उसके गुणों को नहीं समझता, वह उसकी निंदा करने लगता है। विद्यार्थी के लिए कुछ और हिदायत देते हुए चाणक्य कहते हैं कि विद्यार्थी को काम, क्रोध, लोभ, मोह, खेल- तमाशे और शृंगार तथा अधिक सोने से बचना चाहिए क्योंकि ये दुर्गुण हैं और इनसे उसके मन में विक्षेप पैदा होता है। इनसे उसकी ऊर्जा का व्यय होता है, जिससे एकाग्रता पर असर पड़ता है। ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि वर्णों के संबंध में बताते हुए चाणक्य कहते हैं कि जो व्यक्ति कंदमूल फल खाकर अपना जीवन बिताता है, जो प्रतिदिन पितरों का श्राद्ध करता है, ऐसे ब्राह्मण को ऋषि कहा जाता है। इस प्रकार ऋषि वह है जो संयमी है और अपने पूर्वजों के प्रति जिसके मन में सम्मान का भाव है। जो व्यक्ति एक समय के भोजन से संतुष्ट रहता है तथा अध्ययन-अध्यापन का काम करता है, उसे द्विज कहते हैं। जो ब्राह्मण संसार के कामों में लगा हुआ है और पशुपालन, खेती आदि करता है, उसे वैश्य कहा जाता है। जो ब्राह्मण की सेवा करता है और शराब, मांस आदि बेचकर अपनी जीविका चलाता है, उसे शूद्र कहते हैं। उनका कहना है कि ब्राह्मण का कर्तव्य यह है कि वह अन्य लोगों के कार्य की सिद्धि में उनकी सहायता करे, दूसरों से छल-कपट न करे। जो ब्राह्मण सार्वजनिक स्थलों, जैसे- बावड़ी, कुआं, तालाब मंदिर और पार्क आदि को अपवित्र करता है, वह म्लेच्छ है।

जो ब्राह्मण और विद्वानों के धन को चुरा लेता है, दूसरों की स्त्रियों का सम्मान नहीं करता और सभी प्रकार के लोगों के साथ जीवन बिता लेता है, वह ब्राह्मण न होकर चाण्डाल है।
अंत में, चाणक्य कहते हैं कि सज्जन और महात्मा व्यक्ति धन को कभी इकट्ठा नहीं करते, वे उसे दान देने की वस्तु समझते हैं, वे इसका प्रयोग धर्म द्वारा यश प्राप्ति के लिए करते हैं जबकि कंजूस धन का प्रयोग अपनों पर और स्वयं पर भी नहीं करते। ऐसा धन नष्ट हो जाता है। तब कंजूस के पास पछतावा करने के अलावा कुछ नहीं बचता। दुष्ट के धन की गति भी विषयों के भोग में होती है। विषय भोग क्षणिक होने के कारण अपना फल भी उसी रूप में देते हैं। वह सुख-दुख देते हैं।

Chanakya Niti (Chapter-14) चतुर्दश अध्याय का सार

चाणक्य ने अनेक बार 'मनुष्य' की श्रेष्ठता को स्वीकार किया है। उनका कहना है कि यदि मनुष्य जीवन एक क्षण के लिए भी प्राप्त होता है तो उस काल में भी मनुष्य को श्रेष्ठ कर्म करने चाहिए और यदि उसका जीवन एक युग से भी अधिक हो तो भी उसे बुरे कर्मों में लिप्त नहीं होना चाहिए।
चाणक्य कहते हैं कि मनुष्य को चाहिए कि वह जो समय बीत चुका है, या जो आगे आने वाला है, इसकी चिंता छोड़कर वर्तमान की ओर ही ध्यान दे। समस्याओं का समाधान उसी में निहित है। मनुष्य की सफलता उसके स्वभाव पर निर्भर करती है। वह स्वभाव से ही सज्जन पुरुषों और अपने माता-पिता को प्रसन्न कर सकता है। महात्माओं का स्वभाव ही ऐसा होता है कि वे धन को तिनके के समान तुच्छ समझते हैं, यदि उनके पास अधिकाधिक धन हो जाए तो भी वे अभिमान नहीं करते, वे उसी प्रकार नम्र होकर झुक जाते हैं, जिस प्रकार फल से लदी हुई वृक्ष की शाखा आचार्य का कहना है कि अपने बन्धु बान्धवों के प्रति कर्तव्य पूरे करते हुए उनसे इतना अधिक लगाव नहीं बढ़ाना चाहिए कि उनके बिछड़ने से कष्ट अनुभव हो। जो व्यक्ति सदैव सतर्क रहते हैं और समय आने से पूर्व ही आने वाले कष्टों को रोकने के उपाय कर लेते हैं, ऐसे व्यक्ति अपना जीवन सुख से बिता देते हैं, परंतु जो भाग्य के भरोसे रहता है, उसे कष्ट उठाना पड़ता है।


जैसा राजा वैसी प्रजा, एक बहुत पुरानी कहावत है। यह आचार्य चाणक्य के समय से ही प्रसिद्ध हुई दिखाई देती है। चाणक्य कहते हैं कि जिस मनुष्य के जीवन में धर्म का अभाव है, मैं उसको मृत व्यक्ति के समान समझता हूं और धर्माचरण करने वाला व्यक्ति मरने के बाद भी जीवित रहता है। इसी संबंध में आचार्य कहते हैं कि जिस व्यक्ति ने धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चारों में से एक के लिए भी पुरुषार्थ नहीं किया तो समझो कि उसका जीवन व्यर्थ है। शास्त्र धर्म, अर्थ और काम को पुरुषार्थ मानते हैं-मोक्ष उनकी दृष्टि में परमपुरुषार्थ है। यह संकेत है कि इन तीनों की सार्थकता तभी है, जब समस्त बंधनों से जीव मुक्त हो जाएगा।
दुष्ट व्यक्ति जब किसी के बढ़ते हुए यश को देखता है तो वह उसकी निंदा करने लगता है। भगवान श्रीकृष्ण ने भी मनुष्य के मन को ही मनुष्य का सबसे बड़ा मित्र और सबसे बड़ा शत्रु बताया है, क्योंकि उसके विचार ही उसे संसार के मोह-माया में फंसाए रखते हैं, जो उसके लिए बंधन के समान हैं। योगी मन को वश में करके उसके सभी बंधनों को काट फेंकते हैं।


मनुष्य के कर्मों के संबंध में वे कहते हैं कि जिस प्रकार बहुत-सी गौओं में भी बछड़ा अपनी मां को पहचान लेता है और उसी के पीछे-पीछे चलता है, उसी प्रकार मनुष्य के कर्म ही मनुष्य का साथ देते हैं अर्थात वह जैसा कार्य करता है, उसके अनुसार ही उसको फल भोगना पड़ता है।कर्म के संबंध में चाणक्य आगे यह कहते हैं कि मनुष्य को कर्मों के अनुसार ही फल मिलता है और उसकी बुद्धि भी उसके द्वारा किए जाने वाले कर्मों के अनुसार ही कार्य करती है। इतने पर भी विद्वान और सज्जन व्यक्ति सोच-विचार कर कार्य करते हैं क्योंकि वे जानते हैं कि कुछ ऐसा भी है, जिसे बुद्धि द्वारा नई दिशा दी जा सकती है। चाणक्य अंत में मनुष्य के स्वभाव का वर्णन करते हुए कहते हैं कि सज्जन पुरुष अपने कर्तव्य अथवा अपने वचन से कभी भी विमुख नहीं होते, जबकि संकट आने पर बड़ी से बड़ी प्राकृतिक शक्तियां भी मनुष्य का साथ छोड़ देती हैं।

Chanakya Niti (Chapter-15) पञ्चदश अध्याय का सार

इस अध्याय के प्रारंभ में आचार्य ने दया के महत्व को स्पष्ट किया है। उनका कहना है कि जो व्यक्ति इस संसार के प्राणिमात्र पर दया करता है, उसे न तो मोक्ष प्राप्त करने के लिए जप तप आदि साधन की आवश्यकता है और न ही जटाजूट धारण करके साधु-संन्यासी बनने की दया सभी धर्मों का सार है। गुरु के महत्व को बताते हुए आचार्य चाणक्य बताते हैं कि यदि शिष्य गुरु को अपना सर्वस्व समर्पित कर दे तो भी गुरु का ऋण शिष्य से नहीं उतरता। गुरु ही शिष्य को वास्तविक ज्ञान देता है, जिससे उऋण होना संभव ही नहीं है। दुष्ट व्यक्ति से बचने का उपाय बताते हुए चाणक्य कहते हैं कि या तो उसे मसलकर नष्ट कर देना चाहिए अथवा ऐसा प्रयत्न करना चाहिए कि वह आपके कार्य में किसी प्रकार की रुकावट न डाल सके।
चाणक्य का कहना है कि जो व्यक्ति मैले कपड़े पहने रहता है, जिसके दांतों पर मैल जमा हुआ दिखाई देता है, जो हर समय कड़वी बातें करता रहता है तथा जो सूर्योदय और सूर्यास्त के समय सोया रहता है, उसे न तो लक्ष्मी प्राप्त होती है, न ही उसका स्वास्थ्य ठीक रहता है। इसीलिए व्यक्ति को अपने जीवन को सुखी बनाने के लिए प्रकृति के नियमों के अनुसार चलना चाहिए।


आचार्य के अनुसार धन मनुष्य का बंधु और सखा है, इसलिए मनुष्य को धन संग्रह करते रहना चाहिए। उनका यह भी कहना है कि धन को धर्मपूर्वक ही कमाना चाहिए। अन्याय से पैदा किया हुआ धन दस वर्षों से ज्यादा नहीं ठहरता। अनेक विद्वानों का कहना है कि समर्थ व्यक्ति जो कुछ करता है, लोग उसके लिए उसे दोषी नहीं ठहराते - "समरथ को नहिं दोष गोसाईं ।" असमर्थ द्वारा किया गया अच्छा काम भी दोषयुक्त माना जाता है। इसका कारण भय और स्वार्थ है, न कि सत्य दृष्टि । आचार्य ने दान की महिमा का बखान किया है। वे कहते हैं कि ब्राह्मणों को भोजन करवाने के बाद ही गृहस्थ को भोजन करना चाहिए। उनके अनुसार प्रेम और स्नेह उसे ही कहा जाता है, जो दूसरों से किया जाए। अपने संबंधियों तथा मित्रों आदि से तो सभी प्रेम करते हैं। आचार्य ने बुद्धिमान उसे कहा है जो पाप कर्मों की ओर आकृष्ट न हो।
चाणक्य मनुष्यों को यह बताना चाहते हैं कि ज्ञान का कोई अंत नहीं है, जबकि मनुष्य का जीवन बहुत छोटा है। उनका कहना है कि वेद आदि शास्त्रों के पढ़ने पर भी जिसे उनमें वर्णित आत्मा और परमात्मा का ज्ञान नहीं हुआ, उसका जीवन व्यर्थ है। उसका जीवन बिलकुल उसी प्रकार है, जैसे धातु की कलछी स्वादिष्ट भोज्य पदार्थ में घूमती हुई भी उसका स्वाद नहीं ले पाती। चाणक्य कहते हैं कि व्यक्ति जब दूसरों के घर में जाता है अर्थात अपना घर छोड़ता है तो उसे छोटा माना जाता है। चंद्रमा को अमृत का भण्डार कहा जाता है, परंतु जब वह सूर्य की सीध में आता है तो एक प्रकार से उसका अस्तित्व समाप्त हो जाता है, क्योंकि उस समय वह सूर्य से ही प्रकाश ग्रहण करता है।


चाणक्य ने यह बात स्पष्ट करने का प्रयत्न किया है कि ब्राह्मणों के पास धन क्यों नहीं होता? उनका कहना है कि वे सदैव सरस्वती की उपासना में लगे रहते हैं इसलिए धन इकट्ठा करने की उनकी प्रवृत्ति ही नहीं होती। इस संसार में प्रेम का बंधन ही सबसे दृढ़ होता है। चाणक्य उदाहरण देते हुए कहते हैं कि भौरे में इतनी शक्ति होती है कि वह लकड़ियों में भी छेद कर सकता है, परंतु कमल के अनुराग में बंध जाने के कारण उसकी शक्ति व्यर्थ हो जाती है। इसी प्रकार मनुष्य के जो स्वाभाविक गुण हैं, वे कभी भी समाप्त नहीं होते। जिस प्रकार चंदन का वृक्ष छोटे-छोटे टुकड़ों में काट दिए जाने पर भी अपनी सुगंध नहीं छोड़ता, उसी प्रकार श्रेष्ठ कुलीन मनुष्य निर्धन होने पर भी अपने गुणों का त्याग नहीं करता।

Chanakya Niti (Chapter-16) षोडष अध्याय का सार

अध्याय के आरंभ में ही चाणक्य ऐसे व्यक्ति के जन्म लेने को निरर्थक बताते हैं जिसने इस संसार में आकर न तो संसार के किसी सुख का उपभोग किया है और न प्रभु की प्राप्ति के लिए कोई यत्न किया है। विशेष रूप से वेश्याओं के संबंध में चाणक्य ने अनेक स्थानों पर इस बात पर जोर दिया है कि उनका किसी व्यक्ति विशेष से प्रेम नहीं होता, उनका प्रेम केवल व्यक्ति के धन से होता है, परंतु जो व्यक्ति हमेशा यह समझते हैं कि वेश्या उनसे प्रेम करती है, वे मूर्ख ही हैं। और उसी बहकावे में वे कठपुतली के समान उसके इशारों पर नाचते रहते हैं। मनुष्य के स्वभाव के संबंध में आचार्य का कहना है कि अधिकांश व्यक्ति धन-संपत्ति और सांसारिक सुख प्राप्त करने के बाद अभिमान करने लगते हैं। जो व्यक्ति इन्द्रिय भोग की तृप्ति में लगा रहता है, उसके कष्ट कभी समाप्त नहीं होते और यदि स्त्रियां चाहें तो बड़े-से- बड़े तपस्वी व्यक्ति के तप को खंडित कर सकती हैं। इसी प्रकार जो व्यक्ति सदैव हाथ पसार कर मांगता रहता है, उसका कभी सम्मान नहीं हो सकता और जो एक बार दुष्ट व्यक्ति के संपर्क में आ जाता है, उसका जीवन भी सुखी नहीं हो सकता ।
मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम का उदाहरण देते हुए चाणक्य कहते हैं कि जब व्यक्ति के विनाश का समय आता है तो उसकी बुद्धि ठीक से काम नहीं करती। वह भ्रमित हो जाता है, जिस प्रकार श्रीराम सोने के मृग को पकड़ने के लिए उसके पीछे भागे, जबकि सभी जानते हैं। कि सोने का मृग नहीं होता। श्रीराम भी इस सत्य को भलीभांति जानते थे। फिर भी स्वर्णमृग के पीछे भागे।

मनुष्य की श्रेष्ठता किसी ऊंचे पद पर बैठने के कारण नहीं होती, वरन् उसके गुणों के कारण होती है। यदि व्यक्ति में कोई गुण नहीं है, तो अत्यंत धनी होने पर भी उसका सम्मान नहीं होता। मनुष्य के गुणों के संबंध में आचार्य ने एक और महत्वपूर्ण बात कही है। उनका कहना है कि गुणी वस्तुतः उसी को समझना चाहिए जिसके गुणों की प्रशंसा दूसरे लोग करते हों, अपनी स्वयं प्रशंसा करने से मनुष्य बड़ा नहीं बनता। गुणों के संबंध में यह बात और भी महत्व रखती है कि यदि ज्ञानवान व्यक्ति गुणी है तो उसके गुण उसी प्रकार विकसित हो जाते हैं जैसे सोने के आभूषण में जड़ा हुआ रत्न, परंतु उनका यह भी मानना है कि गुणवान व्यक्ति सर्वदा अकेला रहता है, उसे दुख भी उठाने पड़ सकते हैं।
धन संग्रह करना आचार्य की दृष्टि में बुरा काम नहीं है, परंतु दूसरों को दुखी करके और अधर्माचरण से अथवा अपनी दीनता दिखाकर धन इकट्ठा करना उचित नहीं । धन का लाभ तभी है जब उसका ठीक से उपयोग किया जाए। धन एक ऐसी वस्तु है, जिसकी कामना व्यक्ति हर समय करता रहता है। धन के संबंध में उसकी इच्छा कभी पूर्ण नहीं होती। धन का सही उपयोग यही है कि उसे परोपकार में लगाया जाए।


धन के ही संबंध में आगे चलकर चाणक्य एक और महत्वपूर्ण बात कहते हैं कि संसार में तिनका एक अत्यंत हल्की वस्तु है, परंतु तिनके से भी रुई अधिक हल्की होती है। रुई से भी हल्का दूसरों से धन की याचना करने वाला व्यक्ति होता है। वायु तिनके और रुई को उड़ाकर ले जाती है परंतु याचक को क्यों नहीं उड़ाती, इसका कारण संभवतः यह है कि वायु को डर लगता है कि याचक उससे कुछ मांग न बैठे, इस प्रकार उन्होंने याचक को सबसे अधिक अपमानित व्यक्ति माना है। कुछ लोग हर समय हर स्थान पर अपने दरिद्र होने का प्रमाण देते रहते हैं। इस प्रकार के स्वभाव वाले व्यक्ति किसी से दो मीठी बातें करने से भी कतराते रहते हैं। जबकि मीठी बात कहने में किसी प्रकार का मूल्य चुकाना नहीं पड़ता। इस संसार में मनुष्य को अनेक कटु अनुभव होते हैं। प्रिय वचन और सज्जनों की संगति ही दो ऐसी बातें हैं जिससे इस जीवन में कुछ शांति प्राप्त हो सकती है। आचार्य चाणक्य का कहना है कि विद्या मनुष्य के कंठ में रहनी चाहिए, पुस्तकों में लिखी विद्या से काम नहीं चलता। इस प्रकार वह धन भी काम नहीं आता जो दूसरों के पास होता है।

Chanakya Niti (Chapter-17) सप्तदश अध्याय का सार

आचार्य चाणक्य का कहना है कि विद्या गुरु से ही प्राप्त करनी चाहिए, स्वयं विद्या का अभ्यास करने से वह लाभ नहीं होता जैसा गुरु द्वारा प्राप्त की गई विद्या से। उनका कहना है कि जो व्यक्ति आपसे जैसा व्यवहार करता है, उससे उसी प्रकार का व्यवहार करना चाहिए। जिसने आपके प्रति हिंसा का व्यवहार किया है, उसके प्रति हिंसक व्यवहार ही ठीक रहेगा। कुछ महान पुरुष ऐसे भी हुए हैं, जिनका यह कहना था कि हिंसा का उत्तर अहिंसा से दिया जा सकता है। व्यवहार की दृष्टि से एक सामान्य व्यक्ति द्वारा ऐसा कर पाना संभव नहीं हो पाता। ऐसी संत-महात्मा की दृष्टि हो सकती है। चाणक्य ने यह सिद्धांत कूटनीति की दृष्टि से बताया है। देश के संदर्भ में तो 'जैसे को तैसा' की नीति ज्यादा उपयुक्त है।
आचार्य ने इस अध्याय में तप के महत्व को भी स्पष्ट किया है। उनका कहना है कि यदि मनुष्य में तप का अभाव है और वह लोभ में फंसा हुआ है तो उसे और किसी बुराई की क्या आवश्यकता है। यदि मनुष्य का स्वभाव दूसरों की निंदा करना है तो चाणक्य इसे महान पापों की श्रेणी में रखते हैं। उन्होंने सत्य को ही तप बताया है अर्थात जो व्यक्ति सत्याचरण करता है, उसे किसी अन्य तप की आवश्यकता नहीं है।
चाणक्य ने इस अध्याय में दान का महत्व बताते हुए कहा है कि जो व्यक्ति दान नहीं करता, उसे धन की प्राप्ति नहीं हो सकती।

चाणक्य कहते हैं कि मनुष्य का जो वास्तविक स्वरूप है, उसको ही स्थिर रखना चाहिए, उसे प्राप्त करने के लिए किसी प्रकार के ढोंग की आवश्यकता नहीं है। इसी प्रकार उनका यह कहना पूर्णरूप से व्यावहारिक है कि इस संसार में जो व्यक्ति शक्तिहीन होता है, वह ऐसा प्रकट करने लगता है कि उससे बढ़कर कोई सज्जन नहीं, परंतु इस प्रकार के ढोंग को आचार्य चाणक्य नकारते हैं। विवशता में किया जा रहा कार्य स्वभाव की सत्यता को नहीं दर्शाता ।
आचार्य चाणक्य कहते हैं कि अन्न और जल से बढ़कर कोई श्रेष्ठ दान नहीं भूखे व्यक्ति को सोने-चांदी की अपेक्षा भोजन की आवश्यकता होती है। उन्होंने गायत्री को सबसे श्रेष्ठ मंत्र बताया है। उनका यह भी कहना है कि सभी देवी-देवताओं में सबसे श्रेष्ठ स्थान माता का है। दुष्ट व्यक्ति के संबंध में तो अनेक स्थानों पर उसकी दुष्टता का वर्णन किया गया है। दुर्जन अर्थात दुष्ट व्यक्ति सज्जनों को हर समय दुख देता रहता है। उसके शरीर का कोई स्थान ऐसा नहीं, जो दुर्जनता से रहित हो। उसका संग किसी भी तरह से क्यों न हो, हानिकारक ही है। स्त्री के संबंध में आचार्य चाणक्य का मानना है कि उसका कल्याण पति की सेवा से ही होता है। यदि वह पति की सेवा न करके उपवास, दान आदि ही करती रहे तो भी उसका कल्याण नहीं हो सकता। उनके ये विचार व्यवहार की कसौटी पर खरे हैं। पति-पत्नी का यह संबंध गृहस्थ की उन्नति का आधार है। इसी से परिवार में शांति बनी रहती है। दोनों के लिए
परिवार ही श्रेष्ठ है।आचार्य ने जहां दान के महत्व को बताया है, वहां उन्होंने यह भी कहा है कि व्यक्ति की शोभा दान से ही होती है, साज-शृंगार करने से उसकी शोभा नहीं बढ़ती। सज्जनों के संबंध में उनका कहना है कि वे आपत्तियों से इसलिए दूर रहते हैं क्योंकि उनके मन में सर्वसाधारण के प्रति परोपकार करने की भावना रहती है। इससे उनके कष्ट अपने आप दूर हो जाते हैं और उन्हें किसी भी प्रकार की कमी भी नहीं रहती।


सामान्य गृहस्थ के लिए आचार्य का कहना है कि यदि उसकी स्त्री पतिव्रता है, कटु- भाषण नहीं करती और उसके घर में किसी प्रकार की कोई कमी नहीं, उसकी संतान शालीन और विनय आदि गुणों से युक्त है, तो उसका घर ही स्वर्ग के समान है। यह तो सभी जानते हैं कि बहुत-सी बातें पशु और मनुष्यों में एक समान होती हैं। भेद उनमें केवल धर्म के कारण ही होता है। मनुष्य भी पशुओं के समान खाता, पीता, सोता और संतान उत्पन्न करता है, यदि उसमें धर्म का अभाव है, तो उसका जीवन भी पशु के समान समझा जाना चाहिए। बल्कि पशु से भी बदतर, क्योंकि पशु प्रकृति के कुछ निश्चित नियमों में बंधा हुआ है।मनुष्य का जीवन अनेक परिस्थितियों से गुजरता है। माता के गर्भ से जन्म लेने के बाद बच्चे के रूप में उसका विकास होता है। किशोरावस्था के बाद युवावस्था आती है और दिन ढलने के समान मनुष्य का शरीर भी अस्त होने लगता है। उसकी कमर में बल पड़ जाते हैं। उस स्थिति को देखकर अज्ञानी पुरुष ही उसका उपहास कर सकता है, क्योंकि युवावस्था के बाद शरीर का दुर्बल होना अवश्यंभावी है। जो युवा वृद्ध का उपहास करते हैं, वे मूर्ख हैं। वे भूल जाते हैं कि एक दिन उन्हें भी इस अवस्था को प्राप्त होना है।
आचार्य ने इस अध्याय के अंत में एक बहुत ही महत्वपूर्ण बात कही है। उनका मानना है कि यदि किसी चीज में कोई ऐसा गुण है, जिससे अधिकांश लोगों को लाभ होता है तो उसके अवगुण महत्वहीन हो जाते हैं। प्रत्येक व्यक्ति का कर्तव्य है कि वह अपने में लोगों का उपकार करने के गुण का विकास करे। यदि उसमें लोगों के उपकार करने का गुण है तो उसके अन्य दोषों की ओर किसी का ध्यान नहीं जाएगा। इस विशेष गुण के सामने अन्य अवगुण गौण हो जाएंगे।

0 comments: