Friday, 22 April 2022

Garud Puran in hindi गरूड पुराण कथा चतुर्थ अध्याय हिन्दी में स्वर्ग और नर्क लोक में डालने वाले कर्म

जय श्री कृष्ण दोस्तों आज हम गरुण पुराण Garuda Purana Chapter-4 in hindi के चतुर्थ अध्याय हिन्दी में आपको बता रहे है। जिसमें यमलोक मार्ग तथा वैतरणी नदी का सम्पूर्ण वर्णन बताया गया है। दोस्तों हिन्दू धर्म के वेद पुराण में गरूड पुराण एक है । गरुण पुराण  Garuda Puranam हिन्दू धर्म में मृत्यु के बाद सद्गति प्रदान करने वाला है और इसीलिए मृत्यु के बाद गरुड़ पुराण की कथा  Garud Puran Katha-4 के श्रवण का प्रावधान है। इस पुराण में मनुष्य को पाप कर्मों से बचने का प्रावधान बताया गया है। इस गरुण पुराण के अधिष्ठातृ देव भगवान विष्णु माने जाते हैं। (भगवान विष्णु तथा गरुड़ के संवाद में गरुड़ पुराण – पापी मनुष्यों की इस लोक तथा परलोक में होने वाली दुर्गति का वर्णन, दश गात्र के पिण्डदान से यातना देह का निर्माण।) इसीलिए यह गरूड पुराण हमें सत्कर्मों को करने के लिए प्रेरित करता है।  गरूड पुराण प्रथम अध्याय हिन्दी // द्वितीय अध्याय / तृतीय अध्याय 

Garud Puran in hindi गरूड पुराण कथा चतुर्थ अध्याय हिन्दी में स्वर्ग और नर्क लोक में डालने वाले कर्म

हिन्दी अर्थ गरुड़ पुराण चतुर्थ अध्याय गरुड़ पुनः पूछते हैं - हे भगवन् ! किन पापों से जीव यममार्ग में जाता है और किन पापों से वैतरणीनदी में गिरता है , किन पापों से नरक में पड़ता है , वह सब विस्तारपूर्वक मुझसे कहिये || १ || ॥ श्रीभगवान् उत्तर देते हैं - हे गरुड़ ! जो शुभ कर्म से विपरीत हो सदा अशुभ कर्म करते हैं , ऐसे पापी एक नरक में जाकर पुन : दूसरे नरक में जाते हैं और एक दु : ख के अनन्तर पुनः दूसरे दु : ख भोगते हैं अर्थात् पापी पुरुष सदा दुःखादि का अनुभव करते रहते हैं | | २ || इन्हें एक भय के बाद दूसरा भय प्राप्त होता रहता है । धर्मराजपुर के चार दरवाजे हैं ; उनमें पूर्व पश्चिम तथा उत्तर इन तीन दरवाजों से तो धर्मात्मा पुरुष जाते हैं || ३ || केवल दक्षिण द्वार से ही पापी पुरुष जाते हैं । आपत्तिदायक दक्षिणद्वार के मार्ग के बीच में एक वैतरणी नाम की नदी है , उसमें जो पापी पुरुष गिरते हैं , मैं उसको कहता हूँ ॥ ४॥ ब्रह्महत्या करनेवाले , मदिरा पीनेवाले , गोहत्या करनेवाले , बालघाती , स्त्रीघाती , गर्भ को गिरानेवाले , गुप्तरूप से पाप करनेवाले ॥५ ॥ गुरुद्रव्यहर्ता , देवद्रव्यहर्ता , ब्राह्मणद्रव्यहर्ता , स्त्रियों को विश्वास दिलाकर उनके धन को हरनेवाले , बालकों के धन को हरनेवाले , द्रव्य उधर लेने के बाद में न देनेवाले , दूसरे की वस्तु बन्धक रखकर उसे न देनेवाले , विश्वासघाती , जहरमिश्रित अन्न देकर मारनेवाले पापी पुरुष , दूसरों के अवगुणों का प्रकाशन करनेवाले और उसके गुण की प्रशंसा न करनेवाले , गुणवान् पुरुष से ईर्ष्या रखनेवाले , नीच पुरुषों का साथ करनेवाले , सत्संगति से विमुख रहनेवाले , तीर्थों की , सत्कर्म की , गुरु की और देव की निन्दा करनेवाले और पुराण , वेद , मीमांसा , न्याय , वेदान्त आदि को दूषण लगानेवाले , दूसरे को दु : खी देखकर आप प्रसन्न होनेवाले , सुखी को दुःखी बनानेवाले , कटुवचन बोलनेवाले , मन में बुरी बात रखनेवाले , हित की बात भी न सुननेवाले , शास्त्र की आज्ञा किसी भी समय न माननेवाले , ऐसे अभिमानी , मूर्ख , अपने को पंडित मानने वाले , पूर्व में गिनाये गये और भी दूसरे धर्मरहित बहुत से पापी जीव रात - दिन रोते हुए यममार्ग में आते हैं ।। ६-१२ ।। 

इस प्रकार यममार्ग में चलते हुए जो पापी जीव यमदूतों की ताड़ना से वैतरणी नदी में जाकर गिरते हैं अब उनको कहता हूँ।।१३ ॥ जो माता , पिता , गुरु , आचार्य आदि का अपमान करते हैं , वे मनुष्य वैतरणी नदी में गिरते हैं || १४ || अच्छे स्वभाववाले से द्वेष करने वाले , द्वेष से पतिव्रता स्त्री का त्याग करनेवाले पुरुष वैतरणी नदी में पड़ते हैं || १५ || हजारों गुण जिस पुरुष हैं उनमें दोष आरोपण कर सत्पुरुषों की निन्दा करनेवाले मनुष्य वैतरणी नदी में पड़ते हैं || १६ || ब्राह्मण को यह कहकर कि , तुमको मैं इस प्रमाण से दान दूँगा , फिर बाद में जो उस प्रकार दान नहीं देता , कोई प्राणी ब्राह्मण को घर में दान देने के लिए बुलाकर बाद में तुमको मैं दान नहीं दूंगा , ऐसा कहने वाले का वैतरणी नदी में सदा निवास रहता है || १७ || जो दान देकर आप ही हर लेता है , दान देने के बाद दुःख मानता है कि व्यर्थ में दान किया , इनके देने से कुछ भी नहीं हो सकता और दूसरे की जीविका को हर लेता है , दूसरे को दान देने से जो कोई रोकता है || १८ || यज्ञ का विध्वंस करता है , कथा कहनेवाले के बीच में विघ्न करता है , दूसरे के अन्नवाले क्षेत्र को हर लेता है , जिस देश में गायें चरती हैं , उस जगह खेती करता है ॥ १ ९ ॥  ब्राह्मण होकर घृत , तेल , गुड़ आदि का व्यापार करता है , ब्राह्मण होकर शूद्र स्त्री का सेवन करता है , वेदोक्त यज्ञ के अतिरिक्त अपने लिये पशुहिंसा करता है ॥२० ॥ कभी संध्या , सेवा , पूजादि नहीं करता है और मांसभक्षण तथा मदिरापान करता है , बड़ों की आज्ञा में नहीं चलता है , शास्त्र आदि का अध्ययन नहीं करता है || २१॥ शूद्र होकर वेद पढ़ता है , जो शूद्र कपिला गाय का दूध पीता है , यज्ञोपवीत धारण करता है , ब्राह्मणी का सेवन करता है || २२ || राजा की स्त्री की इच्छा करनेवाला , परस्त्री को हर लेने वाला , कुमारी लड़की का सेवन करने की इच्छावाला , पतिव्रता स्त्रियों को लांछन लगानेवाला || २३ || इन्हें तथा अन्य बहुत से शास्त्रविरुद्ध कर्म करनेवाले , विहित कर्मों का त्याग करनेवाले ऐसे सभी मूर्ख पापी वैतरणी नदी में गिरते हैं ।। २४ ॥ ऐसे पापीजन सब मार्ग को त्यागकर यमलोक को जाते हैं । वहाँ यमदूत आकर यम की आज्ञा से उन पापियों को वैतरणी नदी में गिराते हैं || २५ || हे गरुड़ ! सब नरकों में इक्कीस नरक अधिक दुःख देनेवाले हैं । इन इक्कीस नरकों में वैतरणी नाम की नदी मुख्य है , यह सबसे अधिक कष्ट को देनेवाली है , इसलिए प्रथम में गिनाये ऐसे अत्युत्कट पापियों को यमदूत वैतरणी नदी में फेंकते हैं ।। २६॥ 

जिसने अपने जीवनकाल में कृष्णा गौ का दान नहीं दिया और जिसके उद्देश्य से और्ध्वदेहिक क्रिया नहीं की गयी , ऐसे मनुष्य वैतरणी नदी में दु : खों को भोग तीर पर शाल्मली वृक्ष के नीचे यातना को भोगते हैं || २७ || झूठी गवाही देनेवाले और धर्म का पाखण्ड करनेवाले , कपट द्वारा धन पैदा करनेवाले , चोरी से जीविका चलानेवाले , बड़े - बड़े वृक्षों को काटनेवाले , वन और वाटिका को नष्ट करनेवाले , व्रत का त्याग , तीर्थयात्रा न करनेवाले और विधवा स्त्री का शील खंडन करनेवाले , स्वामी को दूषण लगानेवाली स्त्री , पर पुरुष का सेवन करनेवाली इत्यादि सब पापी जीव शाल्मली वृक्ष के नीचे आकर दुःख भोगते हैं।।२८-३० ।। यमदूत ऐसे पापियों को प्रताड़ित कर उनको नरक में गिराते हैं । पुनः नरकादि में जो पापी गिरते हैं , उन्हें मैं तुमसे कहता हूँ।॥३१ ॥ नास्तिक , मर्यादा को भेदनेवाले , धर्म में नहीं बल्कि अपने निमित्त धन व्यय करनेवाले , विषय में इच्छा रखनेवाले , दांभिक , अन्य के किये हुए उपकार को न माननेवाले , ये सब नरक में जाते हैं ॥३२ ॥ कूप , तालाब , बावली , देवमन्दिर , प्राणियों के घर आदि को नष्ट करनेवाले भी नरक में जाते हैं ॥ ३३॥ जो स्त्रियों को , बालकों को , नौकरों को , गुरु को बिना भोजन कराये अकेला भोजन करे , या वैश्वदेव के बिना भोजन करे या विष्णु को नैवेद्य न चढ़ाये , ये सब नरक में जाते हैं ॥ ३४ ॥ जो कील से , काष्ठ से , पत्थरों से , काँटों से मार्ग को रोकते हैं , वे नरक में जाते हैं ॥ ३५॥ जो शिव की , शिवा की , विष्णु की , सूर्य की , गणेश की , सद्गुरु की और पंडित की पूजा नहीं करते वे नरक में जाते हैं ॥ ३६॥ ब्राह्मण होकर दासी का सेवन करने से नरक में जाते हैं , ब्राह्मण होकर शूद्राणी से पुत्र को पैदा करने से उसका ब्राह्मणत्व नहीं रहता ।। ३७ || वह ब्राह्मण नमस्कार योग्य नहीं रहता तथा पूजा योग्य भी नहीं रहता ॥ ३८॥ ब्राह्मणों के कलह को , गौवों के युद्ध को जो नहीं रोकते अपितु यह कहकर कि अच्छे लड़ते हैं , अनुमोदन करते हैं वे सब नरक में जाते हैं।।३९ ।


जो पतिव्रता स्त्रियाँ स्वामी को छोड़ अन्य की शरण नहीं जातीं , उनको ऋतुसमय में द्वेषबुद्धि रख ऋतुदान न करनेवाले पति नरकगामी होते हैं । ४० ॥ जो कामान्ध हो रजस्वला स्त्री का सेवन करते हैं , पर्व तिथियों में , जल में , श्राद्धदिन में स्त्री का सेवन करते हैं , वे नरक में जाते हैं।॥४१ ॥ जो पुरुष शरीर का विष्ठा आदि अग्नि में , जल में , पुष्प के बगीचे में , मार्ग के बीच में , गोशाला आदि में गिरानेवाले हैं , वे नरक में जाते हैं ॥ ४२ ॥ धनुष , खड्गादि शस्त्र बनानेवाले तथा शस्त्रादि के बेचनेवाले नरक में जाते हैं || ४३ ॥ वैश्य होकर चर्म का व्यापार करनेवाले , स्त्री होकर व्यभिचार कर आजीविका करे , जहर को बेचनेवाले नरक में जाते हैं।॥४४ ॥ अनाथ पर दया नहीं करनेवाले और सत्पुरुषों से द्वेष करनेवाले , अपराध बिना दण्ड देनेवाले सब नरक में जाते हैं ॥४५ ॥ ब्राह्मण को भोजन की आशा देकर उनको भोजन न करानेवाले नरक में जाते हैं ॥४६ ॥ दांभिक , अन्य के किये हुए उपकार का न माननवाल , ये सब नरक में जाते है ॥३२ ॥ सभी प्राणियों में अविश्वास करनेवाले , प्राणियों पर दया न करनेवाले और सबसे कपट रखनेवाले भी नरक में ही जाते हैं । ४७॥ जो अजितेन्द्रियपुरुष पहले नियम धारण कर पश्चात् उन नियमों को लाभवश त्याग देते हैं , वे नरक में जाते हैं।।४८ ।। जो अध्यात्मविद्या देनेवाले गुरु को नहीं मानते , पुराणवक्ता का सत्कार नहीं करते , वे नरक में जाते हैं । ४ ९ ॥ मित्रद्रोह करनेवाले , प्रेम का परस्पर नाश करनेवाले , आशा भंग करनेवाले सब नरक में जाते हैं । ५० ॥ विवाह में भंग डालनेवाला , तीर्थयात्रा में विघ्न डालनेवाला , तीर्थ को जाते समय लोगों को लूटने वाला पापी पुरुष नरक में जाता है ॥५१ ॥ और वहाँ से वह लौटता नहीं किसी के घर में ग्राम में , वन में अग्नि लगानेवाले को यमदूत पकड़कर अग्निकुंड में डालकर पकाते हैं , जब प्रेत दूत के पास छाया की याचना करता है , तब यमदूत असिपत्रवन में उसको ले जाते हैं ।। ५२-५३ ।।


वहाँ तलवार - जैसे तीखे पत्र देह पर गिरने से शरीर कटने लगता है , तब यमदूत कहते हैं— हे प्रेत ! इस ठंडी छाया में बैठकर सुख से निद्रा प्राप्त करो ॥५४ ॥ उस ( प्रेत ) को जब बहुत प्यास लगती है तब वह जल पीने की याचना करता है , तब यमदूत उस पापी को पीने को तपा हुआ तैल देते हैं ॥५५ ॥ वे दूत कहते हैं कि इस पानी को पियो , अन्न भक्षण करो , उस पानी के पीने से उसी क्षण पेट की अँतड़ियाँ जल जाती हैं , इससे देह नीचे गिर जाता है ॥५६ ॥ पुनः उठकर अत्यन्त कष्ट से रोता है , किन्तु पराधीन परवश होकर ऊर्ध्वश्वाँस लेता है , किन्तु बोलने में भी समर्थ नहीं होता ॥५७ ॥ हे गरुड़ ! इस प्रकार पापी पुरुषों को दी जानेवाली अनेक प्रकार की यातनाओं को मैंने तुमसे कहा , अब क्या वर्णन करें ; यही सब शास्त्रों में कहा हुआ है।।५८ ।। इस तरह दुःख पाते हुए भयंकर कुण्ड में महाप्रलयपर्यन्त हजारों स्त्री - पुरुष पड़े रहते हैं ॥ ५ ९ ॥ सब पापी दुःख भोग ब्रह्मा के अन्त दिन में त्रिलोकी का जब नाश होता है , तब उन नरक स्थित प्राणियों का भी नाश होता हैं , फिर सृष्टि की उत्पत्ति के समय वे पापी जीव नरक में ही आकर उत्पन्न होते हैं । इस तरह पापों के अक्षय फल को भोग यमराज की आज्ञा से स्थावरादिक होते हैं।।६० ॥ ये वृक्ष , गुल्म , लता , वनस्पति , पर्वत , तृण ये सब स्थावर कहे जाते हैं , ये सभी महामोह से युक्त हैं । ६१॥ पुनः ये सब कृमि , पशु - पक्षी , मछली आदि देवनिर्मित चौरासी लक्ष ( लाख ) योनियों में भ्रमण करते हैं || ६२ ।। स्थावरादि में ये सब भ्रमणकर मनुष्यता को प्राप्त होते हैं और मनुष्यता में भी नरक से आता हुआ जीव चाण्डाल योनि में उत्पन्न होता है || ६३ || पापों के प्रभाव से चांडालादि योनि में बहुत दुःखी होते हैं , कोई गलित्कोढ़ी , कोई जन्मान्ध , कोई स्त्री पुरुष बड़े - बड़े रोग से घिरे होते हैं


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