Friday, 24 April 2020

चिन्तन और चरित्र क्या है? तथ अच्छे चरित्र निर्माण के महत्वपूर्ण सूत्र जो सफलता व जीवन की दिशा बदल सकते है , change the direction of success and life

चिन्तन और चरित्र क्या है? तथ अच्छे चरित्र निर्माण के महत्वपूर्ण सूत्र जो सफलता व जीवन की दिशा बदल सकते है
What is thought and character?  And important sources of good character building that can change the direction of success and life
Good Character

अच्छे चरित्र का अर्थ
Meaning of good character

अच्छा चरित्र हर किसी व्यक्ति के लिए महत्वपूर्ण है, उस व्यक्ति में  विश्वास , मूल्य , सोच-विचार और व्यक्तित्व का मेल से होता है , इसका पता हमारे कार्य और व्यवहार से ही चलता है । हम जैसा कर्म करते है वैसा ही हमारे साथ घटित होता है।चरित्र की रक्षा किसी अन्य धन की रक्षा से ज्यादा महत्वपूर्ण है ।
जीवन में सच्ची सफलता पाने के लिए व्यक्ति का चरित्रवान होना अति आवश्यक है, सच्ची सफलता से आशय एक ऐसे उद्देश्य की प्राप्ति से है , जो हमारे साथ-साथ समाज के लिए भी कल्याणकारी हो , जो शाश्वत हो और जिसकी  प्राप्ति हमें हर प्रकार से संतुष्टि दे सके और जिसे पाने के बाद किसी अन्य चीज को पाने की ईच्छा न रहे , ऐसे लक्ष्य की प्राप्ति ही सच्ची सफलता कहलाती है ।इसीलिए चरित्र की रक्षा के लिए आजीवन प्रयास कीजिए।

चरित्र निर्माण की महत्वपूर्ण परिभाषाएँ-Important definitions of character formation


डमविल के अनुसार – “चरित्र उन सब प्रवृतियों का योग है, जो एक व्यक्ति में होती हैं। ( Character is the sum of all the tendencies which an individual possesses. )”

चरित्र ही वह दिव्य सम्पति है जो कभी न साथ छोडती है और न धोका देती है।(Character is the divine asset that never leaves or cheats)

 “चरित्र एक गतिशील धारणा है. यह व्यक्ति के दृष्टिकोणों और व्यवहार की विधियों का पूर्ण योग हैं। ( Character is a dynamic prosess. It is the sum total of the attitudes and overt way of behaving of the individual. )”

जीवन में चरित्र निर्माण का महत्व
Importance of character building in life
चरित्रवान होना अति आवश्यक है चरित्र ही हमारे भविष्य को निर्धारित करता है। मनुष्यदेह में आने के बाद अन्य गतियों में जैसे कि देव, तिर्यंच अथवा नर्क में जाकर आने के बाद फिर से मनुष्य देह प्राप्त होता है। इतने समय से यह जीवन व्यर्थ न हो इसीलिए चरित्र को मनुष्य की पूंजी मानी गयी है, और भटकन का अंत भी मनुष्य देह में से ही मिलता है। यह मनुष्यदेह जो सार्थक करने  आया तो मोक्ष की प्राप्ति हो सके ऐसा है और नहीं आए तो भटकने का साधन बढ़ा दे, वैसा भी है! दूसरी गतियों में केवल छूटता है। इसमें दोनों ही हैं। छूटता है और साथ साथ बंधता भी है। इसलिए दुर्लभ मनुष्यदेह प्राप्त हुआ है, तो उससे अपना काम निकाल लो। अनंत अवतार आत्मा ने देह के लिए बिताए। एक अवतार यदि देह आत्मा के लिए निकाले तो काम ही हो जाएगा।

चिन्तन और चरित्र दोनों शब्द एक दूसरे के पूरक हैं । एक दूसरे के प्रति अनन्य रूप से आश्रित इन दोनों शब्दों पर ही व्यक्ति का व्यक्तित्व निर्भर करता है ।

हम जैसा सोचते हैं वह हमारा चिन्तन है और अपने चिन्तन के अनुरूप जो कार्य एवं व्यवहार हम करते हैं हमारा चरित्र है । यह उक्ति सर्वथा सटीक एव उपयुक्त ही है कि - ' व्यक्ति जैसा सोचता है वैसा ही बन जाता है । इसी कथन को तनिक और स्पष्ट करते हुए इस प्रकार समझा जा सकता है - व्यक्ति मन से जैसे विचार रखता है या जो चिन्तन करता है उसी के अनुरूप उसकी वाणी मुखरित होती है । वह जैसा बोलता है वैसा ही व्यवहार करने लगता है । व्यक्ति का कार्य - व्यवहार उसकी आदतों में ढल जाता है । उसकी आदतें ही उसके चरित्र का निर्माण करती हैं तथा व्यक्ति का चरित्र ही उसका व्यक्तित्व है । इसी चरित्र की यत्न पूर्वक रक्षा करने की बात शास्त्रों में की गई है , हमें अपने चरित्र की यत्न पर्वक रक्षा करनी चाहिए ।

धन तो आता है और चला जाता है । एक बार गया हुआ धन पुनः प्राप्त किया जा सकता है किन्तु यदि चरित्र नष्ट हो गया तो उसे नष्ट ही हुआ समझें उसे पुनः प्राप्त नहीं किया जा सकता ।

चरित्र विषयक एक प्रचलित उक्ति यह भी है कि -
" धन गया कुछ नहीं गया , स्वास्थ्य गया तो कुछ गया और यदि चरित्र चला गया तो समझो सर्वस्व चला गया । "

इतने महत्त्वपूर्ण चरित्र के प्रति सतत , सजग एवं सावधान रहने की आवश्यकता है ।

चरित्र की विशेषताएं (Character Features

चरित्र की श्रेष्ठता सतत् शुद्ध चिन्तन के अभ्यास से हा अर्जित की जा सकती है । मन और मस्तिष्क से सुविचार और सच्चिन्तन का निरन्तर अभ्यास किया जाना चाहिए । अशुभ चिन्तन से न केवल अपना अपितु अपने स्वजनों तथा सम्पूर्ण समाज का अमंगल एवं अनिष्ट होता है । मन कोइ
कूड़ाघर नहीं कि जिसमें अनाप - सनाप विचारों को भरते रहा जाय । मनोविनोद के नाम पर हल्के और अहितकर विचारों को कभी मन में नहीं आने देना चाहिए ।

हमेशा अच्छे साहित्य का अध्ययन करते रहने से , अच्छे मित्रों तथा परिजनों के पास बैठने से वैचारिक पवित्रता आती है । परम पूज्य गुरुदेव पं० श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा निर्दिष्ट चार संयमों के अन्तर्गत विचार संयम को भी बहुत महत्त्व दिया गया है । इन्द्रिय संयम , समय संयम तथा अर्थ संयम के साथ हमें विचार संयम के प्रति भी सदैव सचेत एवं जागरूक रहना चाहिए । गीता के दूसरे अध्याय में विषय चिन्तन के द्वारा बुद्धि नाश की प्रक्रिया को बड़े मनोवैज्ञानिक तरीके से समझाया गया है ' विषयों के चिन्तन करने से उनके संग की , उन्हें भोगने की इच्छा होती है । विषयों के सेवन से कामना उत्पन्न होती है ।

कामना से क्रोध , क्रोध से संमोह अथात मूढ़ता , इससे स्मृति नाश व स्मृति नाश से बुद्धि नाश तथा बुद्धि नष्ट होने स व्यक्ति का सर्वनाश ही हुआ समझें । ' इससे स्पष्ट हो गया कि चिन्तन या सोच कितना महत्वपूर्ण है ।

चरित्र निर्माण के सूत्र -
Character building formula

चिन्तनचरित्र को कितना और कैसे प्रभावित करता है इस समझने के पश्चात् हम यह भी - जानें कि चरित्र क्या है ? तथा इसके निर्माण हतु हमें क्या करना है । आइए कुछ प्रमुख बिन्दुओं पर विचार करते हुए इसे समझा जाय ।

मन की पवित्रता -
Purity of mind

बाह्य शद्धि एवं पवित्रता की तरह ही अंत : करण एवं मन की भी पवित्रता अति महत्वपूर्ण है । मन को अच्छे अच्छे विचारों एवं सद्भावनाओं से सदा ओत - प्रोत रखने का प्रयास करना चाहिए । छल , दंभ , द्वेष पाखण्ड झूठ आदि मनोविकारों से सदैव मक्त रहने का ही प्रयास करना चाहिए । शिष्टता , साम्यता , मृदुता , दया मैत्री , करुणा , आदि सदविचारों से परित मन के द्वारा सदैव भाग पर ही आगे बढ़ा जाय । ' भूलि न देइ कुमारग पाऊ ' कुमार्ग पर भूल कर भी कदम न रखें ।

सदाचरण का अभ्यास - 
Practice of good conduct
विचारों की शद्धता के बाद उनके अनुरुप आचरण पर सदेव ध्यान दिया जाना चाहिए । कथनी और करनी में एक रूपता के लिए व प्रयत्नशील रहना चाहिए । अपने कार्यों पर सदैव पैनी दृष्टि रखकर एक रूक प्रहरी की तरह भटकाव एवं गलत आचरण से बचे रहना चाहिए ।

प्रतिदिन सायंकाल अस्ताचलगामी सूर्य को देखकर यह भावना की जानी चाहिए ' बार - बार उठ - उठ कर अर्थात् जागरूकता पूर्वक यह सोचना चाहिए कि आज मेरे द्वारा कौन सा सत्कार्य किया गया अन्यथा आज के इस अस्त होते हुए सूर्य के साथ मेरी आयु का एक भाग भी अस्त हो रहा है । ऐसा प्रेरक चिन्तन हमें सत्कर्मों के लिए प्रेरित करता रहेगा । इससे हम आदर्श चरित्र के धनी बन सकेंगे । '

स्वमूल्यांकन करें  - 
Evaluate
इस प्रकार अपने कृत कार्यों का स्वतः ही मूल्यांकन भी किया जाना चाहिए । अपने कार्य - व्यवहार के मूल्यांकन में पूरी तरह से निष्पक्ष एवं वस्तुनिष्ठ दृष्टिकोण रखना चाहिए । अपनी प्रतिदिन की त्रुटियों का भी लेखा जोखा रखा जाना चाहिए । प्रतिदिन पिछली भूलों तथा भूलों के निराकरण के लिए भी जागरुकता के साथ प्रयत्न करते रहना चाहिए ।

इस उद्देश्य से प्रतिदिन के कार्यों की दैनन्दिनी ( डायरी ) रखना एक अच्छी और उपयोगी आदत कही जा सकती है । माता - पिता - गुरु के मार्गदर्शन में सदा आगे बढ़ने के संकल्प तथा प्रेरणा प्राप्त करके अपना उद्धार अपने आप ही करने का प्रयास करते रहना चाहिए

अपने अन्दर आत्मविश्वास व आत्मनिर्भरता जगाएं
Arouse confidence and self-reliance
आगे बढ़ने के लिए अपने ऊपर पूरा विश्वास होना चाहिए , डगमग सोच , अपने प्रति शंका तथा आत्महीनता से सदा बचे रहना चाहिए । सामने आने वाली चुनौती तथा संघर्षों का सामना विश्वास पूर्वक तथा निर्भयता पूर्वक करना चाहिए । विश्वासं फलदायकम् ' विश्वास ही सदैव फलदायी होता है निर्भयता सतगुणों की सेना का सेनापति है ।

सभी सदगणों को रखने के लिए सच्ची बहादुरी एवं निर्भयता की आवश्यकता है । महापुरुषों ने जीवन की सफलता के चार मंत्र बताए हैं - समझदारी , ईमानदारी , जिम्मेदारी और बहादरी इसे जीवन में पक्के निश्चय से पालन करते रहा जाय । चरित्र निर्माण का महत्वपूर्ण सूत्र यही है कि अपने पर निर्भर रहने की वत्ति दिनों - दिन बलवती होनी चाहिए । परमुखापेक्षा तथा परावलम्बी का चरित्र टिकाऊ व सदढ सकता ।

साहस और दृढ़ निश्चिय भी आदर्श चरित्र के लिए परमावश्यक सदगुणों के द्वारा ही आदर्श चरित्र वाले महापुरुषों ने बड़े - बड़े कार्य किए पारित्रिक गुणों का विकास करते रहना चाहिए । अपने चिन्तन को उत्तरोत्तर उदात्त एवं व्यापक बनाते हुए तदनुसार ही कार्य करे।

उदारता एवं सहृदयता अपनाएं - 
Adopt generosity and warmth
चारित्र्यबल की वृद्धि के लिए व्यक्ति को संग दिल एवं तंग दिल नहीं होना चाहिए । उसे कठोर एवं संकीर्ण नहीं होना चाहिए । प्राणिमात्र के प्रति उदारदृष्टिकोण होना अच्छे एवं महान चरित्र का लक्षण है । स्वार्थ एवं संकीर्णता की भावना आज इतनी अधिक बढ़ने लगी है कि इसी आपा - धापी में चरित्र अदृश्य होता सा लगता है । इसके लिए हर एक में उदारता एवं सहृदयता का भावना का प्रयास होना आवश्यक है ।

उदारता एवं सहृदयता की वृद्धि के लिए हम अपनी सोच को संवेदनशील एवं सहानुभूति पूर्ण बनाना होगा । दूसरों के सुख - दुख भी हमारी ही तरह हैं । अपने हित की तरह दूसरों के हित का भी सदैव ध्यान रखा जाय । उदारता एवं सहृदयता की कसौटी हमें इस सूक्ति में मिलती है --
 "आत्मनः प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत् ।"

जो व्यवहार हमें अपने लिए प्रतिकूल लगे उसे दूसरों के प्रति कदापि न करें । कुल मिलाकर हम हमेशा भलाई के बारे में ही सोचें , अच्छा ही बोलें तथा उत्तम मा को ही करते रहें तो निश्चित ही हम स्वयं भी आदर्श चरित्र के धनी बन तथा चारों ओर के समाज में भी चारित्रिक गुण का भी निश्चय ही विकास हो सकेगा ।

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